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शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

एक गिलास पानी. (लघुकथा)

          कालान्तर में एक स्वयंभू प्रतापी राजा थे । प्रतापी इसलिये कि अपनी सत्ता और शक्ति पर उन्हें बहुत गर्व था चाहे जितना नरसंहार हो पडोसी राज्यों पर आक्रमण करके उसे अपने राज्य में मिलाना उनका एकमात्र लक्ष्य था, और स्वयंभू इसलिये कि वे स्वयं को बहुत धार्मिक, दानी और साधु-महात्मा व विद्वानों का आदर-सत्कार करने में पीछे भी नहीं समझते थे ।
       घूमते-घूमते एक विद्वान साधु उनके नगर में आए । यथोचित मान-सम्मान के बाद राजा ने उनसे कुछ ज्ञान-शिक्षा की बातें जानना चाही ।  साधु बोले- राजन, यदि आप कभी जंगल में शिकार के लिये निकलो और शिकार का पीछा करते हुए अपने लाव-लश्कर से बिछड जाओ, रास्ता भी भटक जाओ, जंगल के एकान्त में बस भटकते रहो, खाना तो दूर दो-तीन दिनों तक पानी की एक बूंद भी आपको देखने तक के लिए न मिल पाए, प्यास के मारे आपके प्राण संकट में पड जाएँ, ऐसी स्थिति में यदि कोई फरिश्ता आपको पानी पिलाने के लिये प्रकट हो जावे तो आप उसे क्या देंगे ?  राजा बोले- मैं उसे अपना आधा राज्य दे दूँगा ।
       ठीक है. कहते हुए साधु ने फिर पूछा- इसके ठीक विपरित स्थिति में यदि कभी आप बीमार व असहाय  अवस्था में बिस्तर पर पडे हों । भोजन तक आपका शरीर हजम नहीं कर पा रहा हो । वैद्यों के परामर्श पर सिर्फ दवाईयों से ही आपकी जिन्दगी चल रही हो । गुर्दे भी काम नहीं कर पा रहे हों आमाशय में पानी बढते हुए पेट फूलकर कुप्पा हो चुका हो । दवाईयां भी पेट में संचित पानी को पेशाब के द्वारा बाहर नहीं कर पा रही हों जिसके कारण आपके प्राण संकट में आ चुके हों ऐसे में यदि कोई जानकार अपने ज्ञान से पेशाब के द्वारा आपका पेट खाली करवाकर आपकी प्राणरक्षा करवा दे तो आप उसे क्या देंगे ?  राजा फिर बोले- मैं उसे अपना आधा राज्य दे दूँगा ।

       तब साधु हँसते हुए राजा से बोले- तो राजन, आपका यह सारा साम्राज्य जिसके विस्तार में आप निरन्तर सैकडों, हजारों बेकसूर सिपाहियों की जान से रोजाना खेल रहे हैं, इसकी कुल कीमत एक गिलास पानी से ज्यादा क्या है ?  राजा को बात समझ में आ गई ।
       उस राजा को तो शायद उस कालखंड में ये बात समझ में आ भी गई हो । किन्तु वर्तमान में इन्दिरा शासनकाल से लगाकर जो हम निरन्तर देख रहे हैं- बडे-बडे नाम, बडे-बडे क्षत्रप । संजय से लगाकर हर्षद मेहता जैसे नामों से होते हुए आज तक नित नए खुल रहे भ्रष्टाचार प्रकरणों पर नजर डालें तो सबका एक ही लक्ष्य दिखता चला आ रहा है जनता जाए भाड में समूचे देश की दौलत अपनी सत्ता व तिकडमबाजी के बल पर हथियालो । पहले जेबें, फिर घर, और जब बैंकें भी छोटी पडने लगे तो लेजाकर उसे स्विस बैंकों में जमा करदो, और फिर बेमौत मर जाओ । भले ही तब कफन के नाम पर गन्दी सी धोती भी देखने वाले ही उढाकर जा पावें ।

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