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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

एक अबूझ पहेली- जिन्दगी क्या है ?


        
        एक ऐसा प्रश्न जो जितने भी व्यक्तियों के सामने आया सबके उत्तर अलग ही दिखे और शायद ही कभी ऐसा रहा हो कि भिन्न परिवेश में मौजूद किन्हीं दो व्यक्तियों के उत्तरों में कोई समानता मिल पाई हो, क्यों ? जबकि जिन्दगी तो सबकी एक जैसी ही है. वही शरीर, औऱ वही शरीर की एक जैसी कार्यप्रणाली फिर आखिर इस प्रश्न के प्रति सबके अलग विचारों या अलग उत्तरों का कारण क्या ?



       शायद इसलिये कि जिसके भी मन में जब भी ये सवाल उपजा उस समय वो किसी अलग मनोदशा में रहा होगा । यदि किसी बडे लक्ष्य की पूर्ति के लिये कोई जी-जान से अपनी सारी योग्यता व क्षमता के मुताबिक प्रयास करके भी लक्ष्य-पूर्ति नहीं कर पा रहा हो तो उसका उत्तर अलग हो जाएगा, कभी जब नाममात्र के परिश्रम या संयोगवश कुछ बडी उपलब्धियां किसीके खाते में दर्ज हो जावे और उस समय उसके सामने ये प्रश्न आवे तो उसका उत्तर अलग हो जावेगा । कभी जिन्दगी की जटिलताओं के दौर में तो कभी यूं ही सुस्ताने के मूड में जब ये प्रश्न किसी के जेहन में आएगा तो उसका उत्तर फिर अलग हो जाएगा ।
       
       जिन्दगी क्या है इस पहेलीनुमा प्रश्न पर हमारे फिल्मकारों के भी वे विभिन्न दृष्टिकोण जो इनके गीतों के रुप में समय-समय पर हमारे सामने आते रहे हैं उनकी भी बानगी देखिये-

     मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया,
     हर फिक्र को धुँए में उडाता चला गया
  
  जिन्दगी दो पल की इन्तजार कब तलक हम करेंगे भला,
  
  जिन्दगी इत्तफाक है,कल भी इत्तफाक थी आज भी इत्तफाक है.
  
 जिन्दगी मुझको दिखादे रास्ता, तुझको मेरी हसरतों का वास्ता.

    जिन्दगी की ना टूटे लडी, प्यार करले घडी दो घडी.

 
  जिन्दगी के मोड पर जो कोई रास्ता मिला, 

                        तेरी गली से जा मिला
  
   जीवन में पिया तेरा साथ रहे, हाथों में तेरे मेरा हाथ रहे...
 
  अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाउँ...
  
    जिन्दगी के रंग कई रे, साथी रे जिन्दगी के रंग कई रे
   
  जिन्दगी इम्तहान लेती है, दोस्तों की जान लेती है.
  
     समझौता गमों से करलो, जिन्दगी में गम भी मिलते हैं.


     
      जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर,      
            कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
                              
   
     जिन्दगी कैसी ये पहेली हाए,
     कभी तो हंसाए कभी ये रुलाए हाए
   
    
ये जिन्दगी की उलझने, ये गम की मेहरबानियां,
       बस अब तो मौत ही मिले, तो खत्म हो कहानियां.

  
     ऐ जिन्दगी हुई कहाँ भूल जिसकी हमें मिली ये सजा
  
     जिन्दगी क्या है गम का दरिया है
   न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में अजब दुनिया है.

  
     मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया,
     जो लिखा था आंसुओं के संग बह गया.
  
     तुम बिन जीवन कैसे बीता, पूछो मेरे दिल से
  
     जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं
  
     जिन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी,
     मौत मेहबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी


     ये जिन्दगी के मेले, दुनिया में कम न होंगे
                        अफसोस हम न होंगे.
  
     ये जीवन है इस जीवन का यही है, रंग रुप
     थोडे गम हैं, थोडी खुशियां, यही है, यही है छांव-धूप.
    
     तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी हैरान हूँ मैं, परेशान हूँ मैं,
     तेरे मासूम सवालात से हैरां हूं मैं...
   
     इक प्यार का दरिया है, मौजों की रवानी है,
     जिन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है.


     जिन्दगी-जिन्दगी मेरे संग आना, आना जिन्दगी.

 
 
      अर्थात जब जिस फिल्मकार को अपनी फिल्म में नायक या नायिका को जिस भी मनोस्थिति में दिखाने की आवश्यकता लगी, उसने वैसे ही शब्दों और भावों में जिन्दगी को गीतों के इन बोलों के रुप में चित्रित करके हमारे सामने रख दिया । अब आप भी अपने मन में सोचकर देखिये कि आपकी सोच के दायरे में जिन्दगी क्या है ?

      जैसे मुझे लगता है कि जिन्दगी आनन्द और चुनौतियों का मिश्रण है

13 टिप्पणियाँ:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

bahut achchha vishleshan kiya hai zindgi ki bhinn-bhinn sthitiyon me bhinn-bhinn paribhashaon ki..
sundar evam labhprad lekh..

मंजुला ने कहा…

sir font thoda bada kijiye bilkul bhi samgh ni aa rahe.......

JAGDISH BALI ने कहा…

ज़िन्दगी के मायने सबके अपने अपने

अनुपमा पाठक ने कहा…

जिंदगी पर कई रंग सहेजती सुन्दर पोस्ट!

मंजुला ने कहा…

जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं.... ये पन्तिया ही सटीक है ....है न ....वाकई बहुत अच्छा लगा लेख ...वाकई मन खुश होता है दुनिया सुन्दर लगती है ...मन ख़राब तो कचरे का ढेर .....

Sunil Kumar ने कहा…

ज़िंदगी की इतनी विस्तृत विवेचना .....

केवल राम ने कहा…

जिन्दगी के फलसफे को बहुत करीब से जनवा दिया आपने ...अच्छा संकलन है ....."जिन्दगी कैसी है पहली "....."जिन्दगी का सफ़र, है यह कैसा सफ़र ,कोई समझा नहीं ,कोई जाना नहीं" ........मुझे किशोर कुमार जी का यह गीत बहुत पसंद है ..बहुत ..बहुत आभार

unkavi ने कहा…

kaafir ko banaa deti hai taveez kaa mureed,
ek kabra ko mazaar banaatee hai zindagee.

iskaa bhi intezaam ke bezaar na ho.n loge,
har roz naee aas bandhatee hai zindagee.

ye meraa version hai.maaf kijiyegaa aapkee baat padhkar khud ko kahane se rok nahee paayaa.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज़िंदगी ,
दिन का
शोर है
जो ,
रात की
खामोशी में
डूब जाता है ..

ज़िंदगी पर विस्तृत विवेचना अच्छी लगी

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

जिंदगी का हर फलसफा सही है
दिल ने जब-जब जो-जो चाहा
होठों ने वो बात कही है।

किसी ने कहा है...

जिंदगी आँखों से टपका बेरंग कतरा
तेरे दामन की पनाह पाता तो आँसू होता।
..उम्दा पोस्ट।

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

ये जीवन है इस जीवन का यही है, रंग रुप
थोडे गम हैं, थोडी खुशियां, यही है, यही है छांव-धूप.
अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

संजय भास्कर ने कहा…

ज़िंदगी पर विस्तृत विवेचना अच्छी लगी ....आभार ..क्रिसमस की शुभकामनायें

Patali-The-Village ने कहा…

जिन्दगी आनन्द और चुनौतियों का मिश्रण है । उम्दा पोस्ट।

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