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रविवार, 26 दिसंबर 2010

ना में छुपी हाँ...!

        इस मानव जीवन में होश सम्हालते ही मम्मी-पापा जैसे रिश्तों के बाद प्रायः हम सबसे पहले जिन दो शब्दों को सीखते हैं उनमें एक होता है  हाँ और दूसरा ना जिसे बोल न पाने के स्थिति में बच्चे गर्दन हिलाकर भी समझा देते हैं ।

        बात जब ना की होती है तो मतलब स्पष्ट होता है "नहीं"

       लेकिन कभी सोचकर देखें तो हर काम या क्रिया जो हम करते हैं उनमें शायद ही कोई ऐसा होता होगा जो इस ना के बगैर सम्पादित हो पाता हो । नहीं समझे ना...

        चलिये देखते हैं-

                खाना            पीना
                चलना           फिरना
                घूमना           दौडना
                नहाना           धोना
                हँसना            रोना   
                खेलना           खिलाना
                तैरना            व्यायाम करना
                देखना           दिखाना

      आवश्यक नहीं कि इस किस्म के सभी उदाहरण मेरे ध्यान में आ चुके हों । ये तो दो दिन पूर्व एक सज्जन से चल रही चर्चा में जब उन्होंने उल्लेख किया तो मुझे भी लगा कि जानकारी में नवीनता तो है ।

      आपको नहीं लगता क्या ?
       

11 टिप्पणियाँ:

ajit gupta ने कहा…

अक्‍सर देखा गया है कि बच्‍चे नहीं का भाव सबसे पहले सीखते हैं और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि माता-पिता उन्‍हें हमेशा यह नहीं करो, वह नहीं करो की ही सीख देते हैं इसलिए वे भी नहीं ही सीख लेते हैं।

JAGDISH BALI ने कहा…

बहुत रोचक जानकारी !

Sunil Kumar ने कहा…

अच्छी जानकारी , सार्थक पोस्ट, बहुत बहुत बधाई

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत रोचक औए नयी जानकारी..

अनुपमा पाठक ने कहा…

अच्छी जानकारी!

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

bahoot hi rochak jankari. humne to is bat par dhyan hi nahin diya tha......... sunder prastuti.

वाणी गीत ने कहा…

रोचक !

मंजुला ने कहा…

रोचक तथ्य ....धन्यवाद

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जी हाँ । ना की महिमा अपरम्पार है ।
दिलचस्प ।

केवल राम ने कहा…

आदरणीय सुशील बाकलीवाल जी
नमस्कार
सर आपने तो कमाल कर दिया .....मन हर्षित हो गया ...शुक्रिया

हर्षवर्धन वर्मा. ने कहा…

ना के नाना प्रकारों की व्याख्या का धन्यवाद साहब.

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