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शनिवार, 29 जनवरी 2011

दिल्ली से निकले सौ पैसे बस तेरह रह जाते हैं


सब कुछ होकर भी आजादी अभी अधूरी लगती है
 अभी सडक से सिंहासन की लंबी दूरी लगती है ।

 तंत्र प्रजा का स्वयं प्रजा ने अपने लिये बनाया है
 इसे भ्रष्ट करने वाला भी अपनों में से आया है ।

 हम भी गुनहगार हैं पूरे अपना काम कराने को
 हाथ जोडकर रिश्वत देते, सच्चा झूठा पाने को ।

 दिल्ली से निकले सौ पैसे, बस तेरह रह जाते हैं,
 सित्यासी तो सत्यानाशी, बांट-चूंट खा जाते हैं ।

 छोटे से बाबू से लेकर, लालबत्तियां वालों तक,
 यह बीमारी फैल चुकी है साहब और दलालों तक ।

 गुठली-गुठली जनता की है सारे आम इन्हीं के हैं,
 जनता तो है भजन मंडली, चारों धाम इन्हीं के हैं ।

 सरपट घोडे दौडाते हैं, फाईल के मैदानों पर
 उधर गाज गिरती रहती है खेतों पर खलिहानों पर ।

 अपना हक यों छीन-छीन जाना आखिर कब तक सहन करें ?
 हमने अब ये तय कर डाला दुश्मन को निर्वसन करें  ।

  जाग रही है सोई जनता दिन बीते गुमराही के,
 नहीं दुहराने देंगे आगे अब इतिहास तबाही के ।

 नहीं करेंगे भ्रष्टाचार नहीं सहेंगे भ्रष्टाचार,
 जनता का होगा सिंहासन होगी जनता की सरकार ।
प्रस्तुति-  श्री सरोज कुमार (नई दुनिया इन्दौर से साभार)

12 टिप्पणियाँ:

Kailash C Sharma ने कहा…

गुठली-गुठली जनता की है सारे आम इन्हीं के हैं,
जनता तो है भजन मंडली, चारों धाम इन्हीं के हैं ।

एक सार्थक टिप्पणी आज की शासन व्यवस्था पर, जिसके जिम्मेदार कुछ हद तक हम भी हैं. हरेक पंक्ति सटीक और बहुत सुन्दर...

Deepak Saini ने कहा…

सरोज जी ने अच्छा कटाक्ष किया है
शेयर करने के लिए धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सरकारी योजनाओं का दर्द यही है।

कविता रावत ने कहा…

जाग रही है सोई जनता दिन बीते गुमराही के,
नहीं दुहराने देंगे आगे अब इतिहास तबाही के ।
नहीं करेंगे भ्रष्टाचार नहीं सहेंगे भ्रष्टाचार,
जनता का होगा सिंहासन होगी जनता की सरकार ।
..आमीन!!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

छोटे से बाबू से लेकर, लालबत्तियां वालों तक,
यह बीमारी फैल चुकी है साहब और दलालों तक ।

बहुत सही आंकलन किया है ।
हालात को दर्शाती सुन्दर रचना ।

mridula pradhan ने कहा…

गुठली-गुठली जनता की है सारे आम इन्हीं के हैं,
जनता तो है भजन मंडली, चारों धाम इन्हीं के हैं ।
bahut sunder.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत ज़बरदस्त ..... आम आदमी के मन की व्यथा भी कह दी आपने इन व्यंगात्मक पंक्तियों में....

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

गुठली-गुठली जनता की है सारे आम इन्हीं के हैं,
जनता तो है भजन मंडली, चारों धाम इन्हीं के हैं ।
आक्रोश और जोश से भरी रचना !
कविता में भजन मंडली और चारो धाम वाला प्रयोग एक दम नया और प्रभावी है !
कविता में भाव और प्रवाह के साथ साथ विषय -निर्वाह भी आपने बखूबी किया है !
ओज से भरी प्रभावी रचना !

विवेक मिश्र ने कहा…

Sach kaha hai aapne guruwar

दिल्ली से निकले सौ पैसे, बस तेरह रह जाते हैं,
hum chillayte chahe jitana par kuch badal nahi pate hai.
तंत्र प्रजा भ्रष्ट करने वाला भी अपनों में से आया है ,
tabi to bharat desh abhi tak vikasit nahi ho paya hai..

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सही आंकलन किया है| धन्यवाद|

इमरान अंसारी ने कहा…

सुशील जी,

मेरे ब्लॉग मुंशी प्रेमचंद पर आपकी टिपण्णी का तहेदिल से शुक्रिया|

आपने कहा मैं समर्थन के मामले में चूज़ी हूँ.....जहाँ तक मुझे लगता है मैं अब तक चालीस से ऊपर ब्लॉगस का समर्थक हूँ.......पर हाँ मुझे राजनीतिक, धार्मिक, खबरों से सम्बंधित, मुद्दों पर संचालित ब्लॉग पसंद नहीं है......उसकी वजह है राजनीती में मुझे रूचि नहीं, धर्म उससे कहीं ऊपर है जिसे भीड़ मानती है, खबरे देखने के लिए टेलिविज़न, रेडियो, अखबार काफी चीज़े हैं और वहीँ नए मुद्दों पर बहुत कुछ मिलता है.......इसके अतरिक्त मैं किसी समूह का सदस्य नहीं ......तो जो मुझे पसंद आता है और मुझे लगता है आगे भी पसंद आएगा मैं उसका समर्थक हूँ......क्योंकि मेरी नज़र में समर्थक होने का मतलब है उस ब्लॉग पर आप हर बार जाएँ और हौसला बढ़ाते रहें......इसके अतरिक्त जो मुझे पसंद आता है मैं वहां अपनी टिप्पणी ज़रूर छोड़ता हूँ चाहें मैं उसका समर्थक हूँ या नहीं.....बाकी सब अपनी रूचि की बात है|

रही बात मेरे ब्लॉग मुँशी प्रेमचंद पर अगस्त की मेरी पोस्ट की तो उसमे मैंने जो अपील की है वो उन महान लोगों को समर्पित ब्लॉग की है जिन्होंने साहित्य में या मानवता के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया.....जो मेरा लिखा नहीं मैं सिर्फ जरिया हूँ उस महान साहित्य के अंश मात्र को लोगों तक पहुँचाने का| और अगर ऐसा कोई ब्लॉग मेरी नज़र में आता है जो किसी महान आत्मा को समर्पित है तो निसंदेह मैं उसका समर्थक हूँ |

उम्मीद करता हूँ की आप अन्यथा नहीं लेंगे......और आपसे एक आज्ञा चाहता हूँ की अगर मैं ये टिप्पणी आपकी टिप्पणी के साथ अपने ब्लॉग पर पोस्ट करना चाहूँ तो आपको कोई ऐतराज़ तो नहीं होगा|

आप उम्र में मुझसे बड़े है....अगर कुछ गलत कह दिया हो तो माफ़ी चाहूँगा|

Bharti Sukhi ने कहा…

pls apna font white ya black use karen padhne mein bahut dikat aati hai thanks

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