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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

बडा कठिन है...




दानी होकर यश की इच्छा न होना,
 
प्रिय वचन बोलते हुए दान देना,
 
विद्वान होकर विद्या का अभिमान न करना, 
 
वीर होकर क्षमाशील होना,
 
सुन्दर स्त्री के चंचल नयनों के कटाक्ष से प्रभावित न होना, 
 
कटु वचन सुनकर भी उत्तेजित नहीं होना,
 
अवसर मिलने पर चरित्रभ्रष्ट न होना,
 
पराये धन का लालच न करना

और
 
युवा सुन्दर स्त्री का निरन्तर घर से बाहर रहने तथा पुरुषों के अधीन काम करके भी चरित्रभ्रष्ट न होना.
 
यह सब असम्भव नहीं तो भी अत्यन्त कठिन तो अवश्य ही है ।



10 टिप्पणियाँ:

वीना ने कहा…

बहुत बढ़िया बातें लिखी हैं आपने....मन में ठाना जाए तो क्या मुश्किल है...

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

मनन करने योग्य प्रेरक विचार ....आभार

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत बढ़िया बातें लिखी हैं| आभार|

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

मानव जीवन से जुडी बड़े काम की बातें .........ढूँढ-ढूँढ कर लिखी हैं आपने

कविता रावत ने कहा…

kathin kshano mein hi to insaan kee asli priksha hoti hai...badiya prastuti..

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

मनन करने योग्य वचन...

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

wakai kathin hai..bahut hi shandar

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सही कहा ।
आखिरी से सहमत नहीं ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब के सब चिन्तन का निष्कर्ष।

prerna argal ने कहा…

आपकी पोस्ट की चर्चा सोमवार १/०८/११ को हिंदी ब्लॉगर वीकली {२} के मंच पर की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ / हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। कल सोमवार को
ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

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