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शनिवार, 28 जनवरी 2017

असमंजस


होंठो पर तो है हँसी
फिर आँखें नम क्यों  है
पास है हर ख़ुशी
फिर भी कुछ गम क्यों है. . .

राहें तो बहुत आती है नज़र
पर जिस पे चलना है वो अनजान क्यों है
बड़ी कठिन है सच की डगर
झूँठ की राह आसान क्यों है. . .

आज गैर अपने है और अपने गैर हो गए
समझदार होकर भी हम नादान क्यों है
पास आने की बजाय दूर हो रहे
पढ़ लिखकर भी हम अज्ञान क्यों है. . .

जन्म ले बेटा उनके घर
हर पिता का ये अरमान क्यों है
बेटिया सिर्फ दहेज़ की पहचान क्यों है
रोज़ देखते है जुल्म मासूमो पर
फिर भी हम बेजुबान क्यों है. . .

दिन रात दौड़ रहे पैसों की खातिर
खुशियां पैसों का मुकाम क्यों है
आज हर किसी की चाहत है अमीरी
ये पैसा इतना महान  क्यों है. . .

गायब सी हो गयी हमारी अपनी भाषा
विदेशी भाषा होंठों की शान क्यों है
लोग कहते है हम नहीं बदले
ज़माना बदल रहा है
फिर बदला-बदला सा हर इंसान क्यों है.

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