इस ब्लाग परिवार के हमारे सदस्य साथी....

रविवार, 22 जनवरी 2017

एक था बचपन...


             बचपन में तीन तरह के कपड़े होते थे...
          स्कूल के, घर के और किसी खास अवसर के ।
 
और अब  - 
           कैज़ुअल,  फॉर्मल,  नॉर्मल,  स्लीप वियर,  स्पोर्ट वियर, पार्टी वियर, स्विमिंग, जोगिंग, वगैरह-वगैरह ।

          जिंदगी आसान बनाने चले थे । पर वह तो इन कपड़ों की तरह ही कॉम्प्लिकेटेड हो गयी है ।



 बचपन में पैसा जरूर कम था
पर साला उस बचपन में दम था ।

 अब पास महंगे से मंहगा मोबाइल है,
पर बचपन वाली गायब वो स्माईल है ।

न गैलेक्सी, न वाडीलाल, न नैचुरल था,
पर घर पर जमी आइसक्रीम का मजा ही कुछ ओर था ।

अपनी अपनी कारों में घुम रहें हैं हम,
पर किराये की उन साईकिलों का मजा ही कुछ और था ।

"बचपन में पैसा जरूर कम था
पर साला उस बचपन में दम था" 
 

आज कुछ फिर पुराना याद आया,
एक भूला तराना याद आया

 
घर की छत पर वो धूप जाड़े की,
बारिशों में नहाना याद आया

 
कितने अच्छे थे दोस्त बचपन के,
उनके घर रोज़ जाना याद आया

 
मौज मस्ती वो आवारागर्दी,
घर में फिर डांट खाना याद आया

 
गर्मियों की भरी दुपहरी में,
बाग़ से फल चुराना याद आया

 
रोज़ लगती थी ताश की बाज़ी,
हार कर मुँह फुलाना याद आया

 
दूर जा कर कहीं पे चोरी से,
रोज़ धुंआ उड़ाना याद आया

 
खिड़कियों के छुप के पर्दों में,
उसको चुप-चाप तकना याद आया

 
घर के पीछे थी रेल की पटरी,
गाड़ी का छुक-छुकाना याद आया

 
दादी नानी की डांट वो मीठी,
और फिर मुस्कुराना याद आया

 
घोड़े की ढाई घर की चालें वो,
ऊँट का टेढ़े जाना याद आया

 
उसके पीछे घर तलक जाना,
और फिर लौट आना याद आया

 
इम्तिहान के भी दिन वो क्या दिन थे,
दिल का वो धुक-धुकाना याद आया

 
खेल कर घर वो देर से आना,
रोज़ झूठा बहाना याद आया

 
घर में आतीं थीं मेरे दो चिड़ियाँ,
उनका वो चह-चहाना याद आया


वो भी क्या दिन थे खूब बचपन के,
एक गुज़रा ज़माना याद आया     


2 टिप्पणियाँ:

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत खूब ... बीते हुए दिन अक्सर ऐसे ही रोज़ याद आते हैं ... बदलाव कितना कुछ ले के आया पर कितना कुछ खो के भी आया ...

Sushil Bakliwal ने कहा…

जी धन्यवाद...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...