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सोमवार, 27 जून 2011

जीवन सूत्र


सोचिये : जो भी मेरे पास है, मेरे लिये खास है.

हमारी तीन महत्वपूर्ण संपत्तियां हैं - 
 शरीर, संयम और आत्मविकास.
 
कोई भी काम सिर्फ काम चलाने के लिये नहीं बल्कि आगे बढने के लिये कीजिए.
 
यदि आप पूरी जिन्दगी के लिये खुशी चाहते हैं तो अपने काम से प्यार करना सीखिए.
 
असफलता वह अवसर है जब आप 
पूरी समझदारी से दोबारा शुरुआत कर सकते हैं.
 
 खुश रहना भी एक आदत है और लगन से मेहनत करना भी.
 
कोल्हू का बैल सारा दिन घूमता रहता है किन्तु रहता वहीं का वहीं है.
 
पढे-लिखे होने से अच्छा है पढते-लिखते रहना.
 
दलदल में रहोगे तो तैरना नहीं सीखोगे.
 
अपनी ख्वाईशों को पूरा करने की कोशिश जरुर कीजिये,
ताकि भविष्य में ये खेद न रहे कि आपने कोशिश ही नहीं की.

सीधी बातचीत मित्रता बनाये रखने का श्रेष्ठ तरीका है.
 
हर दिन की शुरुआत सुखद, संतुष्ट व सुखी नजरिए से कीजिये, 
आपका दिन सुखद व सफल गुजरेगा.
 
सौजन्य : अहा जिन्दगी (धर्मेन्द्र दकलिया, बीकानेर (राज.)

बुधवार, 8 जून 2011

अपनी- अपनी बारी...


          एक परिचित परिवार, पति-पत्नि और दो पुत्र । खाते-पीते संघर्षशील परिवार के मंध्यमवर्गीय पिता ने तीव्रबुद्धि पुत्रों की शिक्षा में लगन को देखते हुए बडे पुत्र को लगभग 10 लाख रु. खर्च करके डाक्टर बनवाया । छोटे-पुत्र को भी डाक्टर बनवाते शैक्षणिक खर्च सिर्फ छोटे पुत्र का ही 20 लाख तक पहुँच गया । इस दरम्यान पत्नि भी साथ छोड गई और दोनों बच्चों ने विवाह के बाद अपने-अपने अलग-अलग आशियाने बना लिये ।

          अब वृद्धावस्था की मार के साथ जितनी बीमारियां उतने ही कर्जों के भार से उस व्यक्ति की हालत दयनीय है । नाते-रिश्तेदार जब उन बच्चों से अपने पिता को सम्हालने के लिये कहते हैं तो दोनों ही पुत्रों का अलग-अलग किन्तु एक ही जवाब होता है - मुझे उनसे कोई बात नहीं करना, कोई रिश्ता नहीं रखना ।

          सम्भव है कि जमाने के साथ संघर्षशील मनोस्थिति में कभी चिडचिडाहट के दौरान एकाधिक बार उस व्यक्ति के द्वारा अपने बच्चों को डांट देने की स्थिति में ऐसा कुछ भी कभी कहने में आ गया हो जो इन बच्चों को सुनना बिल्कुल भी अच्छा न लगा हो किन्तु यदि ऐसा हुआ भी हो तो क्या इन स्थितियों में उन आर्थिक व सामाजिक रुप से सक्षम पुत्रों द्वारा अपने लगभग असहाय पिता के प्रति ये नजरिया उचित है ?  



        ऐसी ही स्थिति को ध्यान में रखकर राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी ने कभी कहा होगा - 

अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाकर उन्हें पर्याप्त योग्य अवश्य बनवाओ, 
किन्तु उन्हें इतना योग्य भी मत बनवा देना कि बडे होकर वो 
तुम्हें ही अयोग्य समझने लगें ।

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