This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.

इस ब्लाग परिवार के हमारे सदस्य साथी....

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

बडा कठिन है...




दानी होकर यश की इच्छा न होना,
 
प्रिय वचन बोलते हुए दान देना,
 
विद्वान होकर विद्या का अभिमान न करना, 
 
वीर होकर क्षमाशील होना,
 
सुन्दर स्त्री के चंचल नयनों के कटाक्ष से प्रभावित न होना, 
 
कटु वचन सुनकर भी उत्तेजित नहीं होना,
 
अवसर मिलने पर चरित्रभ्रष्ट न होना,
 
पराये धन का लालच न करना

और
 
युवा सुन्दर स्त्री का निरन्तर घर से बाहर रहने तथा पुरुषों के अधीन काम करके भी चरित्रभ्रष्ट न होना.
 
यह सब असम्भव नहीं तो भी अत्यन्त कठिन तो अवश्य ही है ।



सोमवार, 25 जुलाई 2011

सुखी कौन ? दुःखी कौन ??


सुखी कौन ? 

          एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - गुरुदेव इस दुःखी संसार में सुखी कौन है ?
 
          गुरु ने जवाब दिया - वत्स ! जिसे किसी का एक पैसा भी कर्ज न चुकाना हो और शौच से निपटने में एक मिनिट से ज्यादा वक्त न लगता हो वही सुखी है ।
 
          शिष्य ने पूछा - ऐसा क्यों गुरुदेव तो गुरु बोले- ऐसा इसलिये कि कर्जदार न होगा तो मस्त और बेफिक्र रहेगा । कर्ज की चिन्ता से स्वास्थ्य खराब होता है और अपमानित भी होना पडता है । कहावत है कि औरत का खसम आदमी और आदमी का खसम कर्ज । इसी तरह जिसे शौच करते समय न तो इन्तजार करना पडे न जोर लगाना पडे और तत्काल खुलकर पेट साफ हो जाए उसकी पाचन शक्ति का क्या कहना ! इसलिये जिसकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो और तन भी स्वस्थ हो तो मन भी प्रसन्न रहेगा ही । बस ऐसा ही व्यक्ति सुखी होगा । 
 

दुःखी कौन ? 
 
लोकेषु निर्धनो दुःखी,  ऋणग्रस्तस्ततोsधिकम् ।
ताभ्याम् रोगमुक्ततो दुःखी, तेभ्यो दुःखी कुर्भायकः ।।
-विदुर नीति.
 
       संसार के दुःखियों में पहला दुःखी निर्धन है, उससे अधिक दुःखी वह है जिसे किसी का ऋण चुकाना हो, इन दोनों से भी अधिक दुःखी सदा रोगी रहने वाला मनुष्य है लेकिन इन सबसे ज्यादा दुःखी वह है जिसकी पत्नि या पति दुष्ट प्रवृत्ति का हो ।

          उपरोक्त श्लोक में दुःखी व्यक्ति की अलग-अलग किस्मे बताई गई है जो सही भी है किन्तु अनुभव में यह आया है कि जब तक हमें अपने लिये सुख की और दूसरे को दुःख देने की चाह और कोशिश रहेगी तब तक हम दुःखी ही रहेंगे । जैसा हम चाहें वैसा न हो और जैसा न चाहें वैसा हो यही दुःखों का मूल कारण है ।
निरोगधाम से साभार...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...