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गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

नूतन वर्ष में अनुकरणीय....

       लड लें,       झगड लें.
     पिट जाएँ,     पीट दें.
     किन्तु बोलचाल बन्द ना करें.


      क्योंकि बोलचाल बन्द होते ही समझौते के सारे   रास्ते बन्द हो जाते हैं ।
 राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी.

संकल्प इस नूतन वर्ष का भी-
 
गल्तियों से सीखते जाओ और सुधार करते हुए चलते रहो. आखिर तो...
 
जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम.
 

2011 का आगामी नूतन वर्ष आपके लिये शुभ और मंगलमय हो.
 
हार्दिक शुभकामनाओं सहित...
 

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

जाकि रही भावना जैसी... (लघुकथा)

        एक गांव के बाहर एक महात्मा की कुटिया पर आकर एक अन्जान व्यक्ति ने उनसे पूछा- मेरे गांव में अकाल पड गया है । गांव छोडकर दूसरा ठिकाना बनाना आवश्यक हो गया है, क्या मैं इस गांव में शरण ले सकता हूँ ? यहाँ कैसे लोग रहते हैं ? 

        महात्मा ने उत्तर देने के पूर्व उस व्यक्ति से पूछा- जिस गांव से तुम आ रहे हो वहाँ कैसे लोग रहते थे ?

        उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- महाराज वहाँ तो दुर्जन लोग ही ज्यादा रहते थे ।

        महात्मा ने तब उत्तर दिया- भैया यहाँ भी ऐसे ही लोग ज्यादा रहते हैं, आप चाहें तो यहाँ आकर रह सकते हैं । महात्मा का जवाब सुनकर वह व्यक्ति आगे चला गया । 


        कुछ समय बाद एक और व्यक्ति वहाँ पहुँचा और अपने गांव की आपदा बताते हुए उसने भी महात्मा से यही पूछा कि महाराज यहाँ ठिकाना बनाने से पहले मैं आपसे ये जानना चाहता था कि इस गांव में कैसे लोग रहते हैं ?

        महात्मा ने उससे भी वही प्रतिप्रश्न किया कि जिस गांव से तुम आ रहे हो वहाँ कैसे लोग रहते थे ?

        तब उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि महाराज मेरे उस गांव में एक-दूसरे को सहयोग करने वाले सज्जन व्यक्ति ही ज्यादा रहते थे ।

        महात्मा ने तब उत्तर दिया- भैया यहाँ भी ऐसे ही लोग ज्यादा रहते हैं । आप चाहें तो यहाँ आकर रह सकते हैं । 


क्या किसी विस्तृत भावानुवाद की आवश्यकता यहाँ दिखती है ?


रविवार, 26 दिसंबर 2010

ना में छुपी हाँ...!

        इस मानव जीवन में होश सम्हालते ही मम्मी-पापा जैसे रिश्तों के बाद प्रायः हम सबसे पहले जिन दो शब्दों को सीखते हैं उनमें एक होता है  हाँ और दूसरा ना जिसे बोल न पाने के स्थिति में बच्चे गर्दन हिलाकर भी समझा देते हैं ।

        बात जब ना की होती है तो मतलब स्पष्ट होता है "नहीं"

       लेकिन कभी सोचकर देखें तो हर काम या क्रिया जो हम करते हैं उनमें शायद ही कोई ऐसा होता होगा जो इस ना के बगैर सम्पादित हो पाता हो । नहीं समझे ना...

        चलिये देखते हैं-

                खाना            पीना
                चलना           फिरना
                घूमना           दौडना
                नहाना           धोना
                हँसना            रोना   
                खेलना           खिलाना
                तैरना            व्यायाम करना
                देखना           दिखाना

      आवश्यक नहीं कि इस किस्म के सभी उदाहरण मेरे ध्यान में आ चुके हों । ये तो दो दिन पूर्व एक सज्जन से चल रही चर्चा में जब उन्होंने उल्लेख किया तो मुझे भी लगा कि जानकारी में नवीनता तो है ।

      आपको नहीं लगता क्या ?
       

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

एक अबूझ पहेली- जिन्दगी क्या है ?


        
        एक ऐसा प्रश्न जो जितने भी व्यक्तियों के सामने आया सबके उत्तर अलग ही दिखे और शायद ही कभी ऐसा रहा हो कि भिन्न परिवेश में मौजूद किन्हीं दो व्यक्तियों के उत्तरों में कोई समानता मिल पाई हो, क्यों ? जबकि जिन्दगी तो सबकी एक जैसी ही है. वही शरीर, औऱ वही शरीर की एक जैसी कार्यप्रणाली फिर आखिर इस प्रश्न के प्रति सबके अलग विचारों या अलग उत्तरों का कारण क्या ?



       शायद इसलिये कि जिसके भी मन में जब भी ये सवाल उपजा उस समय वो किसी अलग मनोदशा में रहा होगा । यदि किसी बडे लक्ष्य की पूर्ति के लिये कोई जी-जान से अपनी सारी योग्यता व क्षमता के मुताबिक प्रयास करके भी लक्ष्य-पूर्ति नहीं कर पा रहा हो तो उसका उत्तर अलग हो जाएगा, कभी जब नाममात्र के परिश्रम या संयोगवश कुछ बडी उपलब्धियां किसीके खाते में दर्ज हो जावे और उस समय उसके सामने ये प्रश्न आवे तो उसका उत्तर अलग हो जावेगा । कभी जिन्दगी की जटिलताओं के दौर में तो कभी यूं ही सुस्ताने के मूड में जब ये प्रश्न किसी के जेहन में आएगा तो उसका उत्तर फिर अलग हो जाएगा ।
       
       जिन्दगी क्या है इस पहेलीनुमा प्रश्न पर हमारे फिल्मकारों के भी वे विभिन्न दृष्टिकोण जो इनके गीतों के रुप में समय-समय पर हमारे सामने आते रहे हैं उनकी भी बानगी देखिये-

     मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया,
     हर फिक्र को धुँए में उडाता चला गया
  
  जिन्दगी दो पल की इन्तजार कब तलक हम करेंगे भला,
  
  जिन्दगी इत्तफाक है,कल भी इत्तफाक थी आज भी इत्तफाक है.
  
 जिन्दगी मुझको दिखादे रास्ता, तुझको मेरी हसरतों का वास्ता.

    जिन्दगी की ना टूटे लडी, प्यार करले घडी दो घडी.

 
  जिन्दगी के मोड पर जो कोई रास्ता मिला, 

                        तेरी गली से जा मिला
  
   जीवन में पिया तेरा साथ रहे, हाथों में तेरे मेरा हाथ रहे...
 
  अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाउँ...
  
    जिन्दगी के रंग कई रे, साथी रे जिन्दगी के रंग कई रे
   
  जिन्दगी इम्तहान लेती है, दोस्तों की जान लेती है.
  
     समझौता गमों से करलो, जिन्दगी में गम भी मिलते हैं.


     
      जिन्दगी का सफर है ये कैसा सफर,      
            कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं
                              
   
     जिन्दगी कैसी ये पहेली हाए,
     कभी तो हंसाए कभी ये रुलाए हाए
   
    
ये जिन्दगी की उलझने, ये गम की मेहरबानियां,
       बस अब तो मौत ही मिले, तो खत्म हो कहानियां.

  
     ऐ जिन्दगी हुई कहाँ भूल जिसकी हमें मिली ये सजा
  
     जिन्दगी क्या है गम का दरिया है
   न जीना यहाँ बस में न मरना यहाँ बस में अजब दुनिया है.

  
     मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया,
     जो लिखा था आंसुओं के संग बह गया.
  
     तुम बिन जीवन कैसे बीता, पूछो मेरे दिल से
  
     जिन्दगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं
  
     जिन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी,
     मौत मेहबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी


     ये जिन्दगी के मेले, दुनिया में कम न होंगे
                        अफसोस हम न होंगे.
  
     ये जीवन है इस जीवन का यही है, रंग रुप
     थोडे गम हैं, थोडी खुशियां, यही है, यही है छांव-धूप.
    
     तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी हैरान हूँ मैं, परेशान हूँ मैं,
     तेरे मासूम सवालात से हैरां हूं मैं...
   
     इक प्यार का दरिया है, मौजों की रवानी है,
     जिन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है.


     जिन्दगी-जिन्दगी मेरे संग आना, आना जिन्दगी.

 
 
      अर्थात जब जिस फिल्मकार को अपनी फिल्म में नायक या नायिका को जिस भी मनोस्थिति में दिखाने की आवश्यकता लगी, उसने वैसे ही शब्दों और भावों में जिन्दगी को गीतों के इन बोलों के रुप में चित्रित करके हमारे सामने रख दिया । अब आप भी अपने मन में सोचकर देखिये कि आपकी सोच के दायरे में जिन्दगी क्या है ?

      जैसे मुझे लगता है कि जिन्दगी आनन्द और चुनौतियों का मिश्रण है

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

सुखी कौन ?

      सुखी वो नहीं है जिसके पास बहुत कुछ है, बल्कि जिसके पास जो कुछ है उससे संतुष्ट रहने वाला ही सुखी है ।

     सन्तोष का ही दूसरा नाम सुख है, इसीलिये हम दीवारों पर ये उपदेश देखते हुए ही बडे हुए हैं- "सन्तोषी सदा सुखी"

     असन्तुष्ट व लालची स्वभाव के व्यक्ति कितने भी धन व साधन सम्पन्न हो जावें किन्तु सुखी नहीं रह सकते ।

     इसलिये 'हाजिर में हुज्जत नहीं और गैर में तलाश नहीं' के द्येयवाक्य को आत्मसात करके
जीवन में सुखी रहा जा सकता है ।

      इस सन्दर्भ में सुश्लोक सूत्र भी देखिये-   
                माल अंट में - ज्ञान कंठ में.
   
    दाम्पत्य जीवन में सुखी रहने के लिये छोटी दिखने वाली बडी बातें-
  
    जिन दम्पत्तियों का दामपत्य जीवन स्वस्थ होता है उनका पारिवारिक जीवन भी स्वस्थ व सुखी रहता है जिससे वे स्वयं ही नहीं बल्कि उनकी सन्तान भी स्वस्थ व सुखी रह पाती है । दाम्पत्य जीवन के स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखने के लिये कुछ छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर हमेशा बेहतर परिणाम हासिल किये जा सकते हैं-                           
 
     * सिर्फ अहम् भाव के कारण व अकारण अपने जीवन साथी की बात का विरोध न करें । पहले बात को पूरी समझने का प्रयास करें और बात यदि अच्छी लगे या सही लगे तो उसे सहज भाव से स्वीकार कर लें ।

    * जब तक बहुत जरुरी न हो पति को अपनी पत्नि के मायके वालों की निन्दा या उपहास नहीं  करना चाहिये बल्कि समय आने पर उनकी प्रशंसा व उनके घर आने पर उचित आवभगत करना चाहिये इससे गृहलक्ष्मी वास्तविक रुप से प्रसन्न रहती है ।

    * पति को पत्नि के साथ अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिये जिससे कि वह कभी हीन भावना से ग्रस्त न हो बल्कि उसका आत्मविश्वास बना रहे और उसके मन में यह भावना कायम रहे कि वह अपने परिवार का उपयोगी अंग है और घर-परिवार में उसका अपना महत्व है, मान-सम्मान है ।

    * परिवार से सम्बन्धित मामलों में पति को पत्नि से सलाह अवश्य लेना चाहिये जिससे कि वह अपने को कभी उपेक्षित न समझे । इसी प्रकार पत्नि को भी अपने पति से सलाह-मशविरा लेकर ही कोई काम करना चाहिये इससे दोनों के जीवन में सुमति और सौमनस्य कायम रहता है और अकारण वाद-विवाद व कलह की स्थिति निर्मित नहीं होती ।

    * जिन दम्पत्तियों में सुमति और सौहार्द्र वना रहता है वहाँ खुशहाली भी बनी रहती है इसके विपरित जहाँ कुमति और कलह रहती है वहां नाना प्रकार की विपत्तियां और तकलीफें भी बनी ही रहती हैं ।

      ब्रम्हपुराण में कहा गया है कि-
           दमपत्योः समता नास्ति यत्र-तत्र ही मन्दिरे, 
           अलक्ष्मीस्तत्र तत्रेव विफलं जीवनंतयो.
     अर्थात् जिस घर में पति-पत्नि में समता नहीं है वहाँ निर्धनता रहती है और उन दम्पत्ति का जीवन निष्फल हो जाता है ।

        नजीर अकबराबादी के इस शेर को देखिये-

        जो दीन में पूरे हैं वह    हर हाल में खुश हैं,
        हर काम में, हर दाम में, हर हाल में खुश हैं,
        गर माल दिया यार ने    तो माल में खुश हैं,
        बरबादी के भी हाल और   अहवाल में खुश हैं,
        भूख में और प्यास में,   तर माल में खुश हैं,
        पूरे हैं वही लोग जो      हर हाल में खुश हैं,

        जीने की नहीं पर्वाह,     मरने का नहीं गम,
        यकसां है उन्हे जिन्दगी   और मौत का आलम,
        वाकिफ न बरस से न  महिनों से वो इक दम,
        ना रात में मुश्किल है ना दिन का कभी मातम,
        दिन, रात, घडी, पहर, माहों साल में खुश हैं,
        पूरे हैं वही लोग जो     हर हाल में खुश हैं ।


सोमवार, 6 दिसंबर 2010

जीवन के सफर में राही...

                    सैकडों किशोर यहाँ,
                    सैकडों लता,
               पर शिखर नहीं गर आपका
                  तो किसको है पता.

            उनकी तो गूँज भी दुनिया में छा जाएगी
                  तरन्नुम भी आपका
                बस मन में ही बज पाएगा.


               गाड फादर है कोई गर आपका
                    उम्मीद है तब
                 कुछ भी चल जाये वहाँ,

                 संयोगवश बस यूं ही तुम
                     चलने लगे हो
                 तो आफताब या फ्रीडा जैसा
                   हश्र ही रह पाएगा. 


                 बात होवे राजनीति की 
                या मैदान हो फिर खेल का
                फिल्म का पर्दा हो या फिर
                   क्षेत्र हो पुश्तेनी सा,

            धीरुभाई बनने में तो जिन्दगी खप जाएगी
                  मुकेश गर बनना है तो 
                           बस भाग्य ही चल पाएगा.

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निरन्तरता का महत्व. (लघुकथा)


       1.   किसी गांव में एक चरवाहा रहता था । वह नदी पर जब नहाने जाता तो अपने साथ अपने कंधे पर अपने से कई गुना भारी भैंस को उठा कर ले जाता और उसे अपने साथ नहलाकर वैसे ही कंधे पर उठाकर वापस घर लाता था । गांव के सभी लोग उसके इस क्रम से भली-भांति परिचित थे इसलिये उन्हें कोई आश्चर्य भी नहीं होता था । 

       एक बार किसी राजनेता के आगमन की पूर्व तैयारी करते उनके कुछ समर्थकों का उस गांव में आना हुआ । उन्होंने जब उस चरवाहे को इस तरह भैंस को कंधे पर उठाकर नदी तक जाते-आते देखा तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गये । उन्होंने उस चरवाहे से पूछा कि तुम्हारे वजन से कई गुना भारी इस भैंस को तुम इतनी आसानी से कंधे पर कैसे उठा पाते हो ? क्या तुम्हे इसमें कोई कठिनाई नहीं होती ? तब उस चरवाहे ने जवाब दिया कि कठिनाई तो होती है, लेकिन मेरे बचपन में मेरे पिताजी इसे बछडे के रुप में घर लाए थे और खेल-खेल में मैं तबसे ही इसे इसी तरह कंधे पर उठाकर तालाब तक नहलाने ले जाता था । जब इसका वजन मुझसे ज्यादा होता गया और मुझे इसे उठाने में कठिनाई हुई तो मेरे मन ने मुझसे कहा कि कल तो तुमने इसे उठाया था । बस यही एक सोच है जो रोज मुझे इस भैंस को मेरे कंधे पर उठा लेने में मेरे साथ चलती है कि कल तो मैंने इसे उठाया था तो आज क्यों नहीं ?

       2.    बारिश की कमी के कारण एक गांव में अक्सर जमीन के अनुपात में फसल नहीं उपज पाती थी जिसके चलते वहाँ के अधिकतर किसान या तो गांव छोडकर दूसरे गांव पलायन कर गये थे या फिर गरीबी के अभिशाप से त्रस्त जीवन गुजारने पर मजबूर रहते थे । जबकि उस गांव में बारिश की कमी का मुख्य कारण गांव की सीमा से सटा एक विशाल पर्वत था जिसकी चोटी से टकराकर बरसाती बादल उस गांव तक आने के पहले ही पर्वत के दूसरे छोर पर बरस जाते थे । 

       वहाँ के एक युवक ने इस समस्या से गांव को मुक्त करवाने की सोच के साथ हाथ में गेती उठा ली और एक सिरे से उस पर्वत को काटने के दुष्कर कार्य में जुट गया । रोज सुबह उठते ही वह अपने आवश्यक काम निपटाकर हाथ में गेती लेकर आ जाता और पहाड काटने के दुरुह अभियान में भिड जाता । 

       अब तो पर्वतराज को अपनी जान की चिंता सताने लगी । वे अपनी शिकायत लेकर भगवान के दरबार में पहुँचे और बोले- प्रभु इस युवक से मुझे बचाओ ये मुझे नेस्तनाबूद करने पर तुला है । भगवान को पर्वतराज की चिंता पर हँसी आ गई, वे बोले पर्वतराज तुम इतने विशाल आकार में होकर ये कैसी कायरों सी बात कर रहे हो । एक अदना सा आदमी छोटी सी गेती के बल पर तुम्हारा क्या बिगाड लेगा ? तो पर्वत भगवान से बोला- प्रभु आदमी अदना सा है, उसकी गेती भी छोटी सी है लेकिन उसके हौसले जितने बुलन्द हैं वो मुझे नेस्तनाबूद करने के लिये कम नहीं हैं । जब वो थक या मर जाएगा तो अपनी जगह अपने पुत्र को खडा कर जाएगा । मेरा विनाश तो तय है ।

       तो ये हैं निरन्तरता के चमत्कारिक परिणाम । जिसके आगे न भैंस का वजन कोई मायने रख पाता है और न ही पहाड की विशालता । 

       इसलिये जब आप अपने जीवन में किसी कठिन लक्ष्य को चुनौति की मानिन्द सामने रखकर उसे पूर्ण करने में तन-मन से जुट जाओगे तो कोई कारण नहीं है कि सफलता आपसे दूर रह सके ।

       इसी निरन्तरता का एक और कारनामा जो हम सभी जानते हैं वो है कोमल रस्सी के द्वारा कुएँ की पथरीली मुंडेर को घिस-घिसकर चीर देना । जिसके लिये कहा गया है-

                     करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान
                     रसरी आवत जात के, सिल पर पडत निशान.

        तो जब भी आपके समक्ष किसी कठिन कार्य की चुनौति दिखाई दे तो सिर्फ अपनी पूरी योग्यता और क्षमता के साथ उसे पूरा करने में भिड जाओ । देर-सवेर सफलता को आपके द्वार पर दस्तक देनी ही होगी । बस इतना अवश्य ध्यान रखना है कि-

  लक्ष्य जितना विशाल होगा  उसका रास्ता भी उतना ही लम्बा और बीहड मिलेगा ।” किंतु उसकी पूर्ति के बाद आपको मिलने वाला आर्थिक व मानसिक रिटर्न उससे कई गुना अधिक विशाल व आकर्षक  भी मिलेगा ।




शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

एक गिलास पानी. (लघुकथा)

          कालान्तर में एक स्वयंभू प्रतापी राजा थे । प्रतापी इसलिये कि अपनी सत्ता और शक्ति पर उन्हें बहुत गर्व था चाहे जितना नरसंहार हो पडोसी राज्यों पर आक्रमण करके उसे अपने राज्य में मिलाना उनका एकमात्र लक्ष्य था, और स्वयंभू इसलिये कि वे स्वयं को बहुत धार्मिक, दानी और साधु-महात्मा व विद्वानों का आदर-सत्कार करने में पीछे भी नहीं समझते थे ।
       घूमते-घूमते एक विद्वान साधु उनके नगर में आए । यथोचित मान-सम्मान के बाद राजा ने उनसे कुछ ज्ञान-शिक्षा की बातें जानना चाही ।  साधु बोले- राजन, यदि आप कभी जंगल में शिकार के लिये निकलो और शिकार का पीछा करते हुए अपने लाव-लश्कर से बिछड जाओ, रास्ता भी भटक जाओ, जंगल के एकान्त में बस भटकते रहो, खाना तो दूर दो-तीन दिनों तक पानी की एक बूंद भी आपको देखने तक के लिए न मिल पाए, प्यास के मारे आपके प्राण संकट में पड जाएँ, ऐसी स्थिति में यदि कोई फरिश्ता आपको पानी पिलाने के लिये प्रकट हो जावे तो आप उसे क्या देंगे ?  राजा बोले- मैं उसे अपना आधा राज्य दे दूँगा ।
       ठीक है. कहते हुए साधु ने फिर पूछा- इसके ठीक विपरित स्थिति में यदि कभी आप बीमार व असहाय  अवस्था में बिस्तर पर पडे हों । भोजन तक आपका शरीर हजम नहीं कर पा रहा हो । वैद्यों के परामर्श पर सिर्फ दवाईयों से ही आपकी जिन्दगी चल रही हो । गुर्दे भी काम नहीं कर पा रहे हों आमाशय में पानी बढते हुए पेट फूलकर कुप्पा हो चुका हो । दवाईयां भी पेट में संचित पानी को पेशाब के द्वारा बाहर नहीं कर पा रही हों जिसके कारण आपके प्राण संकट में आ चुके हों ऐसे में यदि कोई जानकार अपने ज्ञान से पेशाब के द्वारा आपका पेट खाली करवाकर आपकी प्राणरक्षा करवा दे तो आप उसे क्या देंगे ?  राजा फिर बोले- मैं उसे अपना आधा राज्य दे दूँगा ।

       तब साधु हँसते हुए राजा से बोले- तो राजन, आपका यह सारा साम्राज्य जिसके विस्तार में आप निरन्तर सैकडों, हजारों बेकसूर सिपाहियों की जान से रोजाना खेल रहे हैं, इसकी कुल कीमत एक गिलास पानी से ज्यादा क्या है ?  राजा को बात समझ में आ गई ।
       उस राजा को तो शायद उस कालखंड में ये बात समझ में आ भी गई हो । किन्तु वर्तमान में इन्दिरा शासनकाल से लगाकर जो हम निरन्तर देख रहे हैं- बडे-बडे नाम, बडे-बडे क्षत्रप । संजय से लगाकर हर्षद मेहता जैसे नामों से होते हुए आज तक नित नए खुल रहे भ्रष्टाचार प्रकरणों पर नजर डालें तो सबका एक ही लक्ष्य दिखता चला आ रहा है जनता जाए भाड में समूचे देश की दौलत अपनी सत्ता व तिकडमबाजी के बल पर हथियालो । पहले जेबें, फिर घर, और जब बैंकें भी छोटी पडने लगे तो लेजाकर उसे स्विस बैंकों में जमा करदो, और फिर बेमौत मर जाओ । भले ही तब कफन के नाम पर गन्दी सी धोती भी देखने वाले ही उढाकर जा पावें ।

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

विचार यात्रा- समझ.

                                                   "odzcd2n5sit6"
                               विचा यात्रा
  •      "हम कोरी स्लेट के समान इस दुनिया में अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ करते हैं । जैसे-जैसे हमारी समझ विकसित होती है- हम अपने माता-पिता-गुरु,  घर-परिवार, स्कूल-कालेज, मित्र-परिचित, साहित्य-सिनेमा, और जहाँ तक जिनके भी सम्पर्क में आते हैं, प्रत्येक से रोजमर्रा की जिन्दगी में कुछ-न-कुछ नया सीखते व समझते हैं । अब इनमें जिन भी विचारों को हम अपनी सोच और व्यवहार के अधिक करीब पाते हैं, अंततः वे हमारे अपने विचार बन जाते हैं ।"
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