मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

जाकि रही भावना जैसी... (लघुकथा)

        एक गांव के बाहर एक महात्मा की कुटिया पर आकर एक अन्जान व्यक्ति ने उनसे पूछा- मेरे गांव में अकाल पड गया है । गांव छोडकर दूसरा ठिकाना बनाना आवश्यक हो गया है, क्या मैं इस गांव में शरण ले सकता हूँ ? यहाँ कैसे लोग रहते हैं ? 

        महात्मा ने उत्तर देने के पूर्व उस व्यक्ति से पूछा- जिस गांव से तुम आ रहे हो वहाँ कैसे लोग रहते थे ?

        उस व्यक्ति ने उत्तर दिया- महाराज वहाँ तो दुर्जन लोग ही ज्यादा रहते थे ।

        महात्मा ने तब उत्तर दिया- भैया यहाँ भी ऐसे ही लोग ज्यादा रहते हैं, आप चाहें तो यहाँ आकर रह सकते हैं । महात्मा का जवाब सुनकर वह व्यक्ति आगे चला गया । 


        कुछ समय बाद एक और व्यक्ति वहाँ पहुँचा और अपने गांव की आपदा बताते हुए उसने भी महात्मा से यही पूछा कि महाराज यहाँ ठिकाना बनाने से पहले मैं आपसे ये जानना चाहता था कि इस गांव में कैसे लोग रहते हैं ?

        महात्मा ने उससे भी वही प्रतिप्रश्न किया कि जिस गांव से तुम आ रहे हो वहाँ कैसे लोग रहते थे ?

        तब उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि महाराज मेरे उस गांव में एक-दूसरे को सहयोग करने वाले सज्जन व्यक्ति ही ज्यादा रहते थे ।

        महात्मा ने तब उत्तर दिया- भैया यहाँ भी ऐसे ही लोग ज्यादा रहते हैं । आप चाहें तो यहाँ आकर रह सकते हैं । 


क्या किसी विस्तृत भावानुवाद की आवश्यकता यहाँ दिखती है ?


सोमवार, 13 दिसंबर 2010

सुखी कौन ?

      सुखी वो नहीं है जिसके पास बहुत कुछ है, बल्कि जिसके पास जो कुछ है उससे संतुष्ट रहने वाला ही सुखी है ।

     सन्तोष का ही दूसरा नाम सुख है, इसीलिये हम दीवारों पर ये उपदेश देखते हुए ही बडे हुए हैं- "सन्तोषी सदा सुखी"

     असन्तुष्ट व लालची स्वभाव के व्यक्ति कितने भी धन व साधन सम्पन्न हो जावें किन्तु सुखी नहीं रह सकते ।

     इसलिये 'हाजिर में हुज्जत नहीं और गैर में तलाश नहीं' के द्येयवाक्य को आत्मसात करके
जीवन में सुखी रहा जा सकता है ।

      इस सन्दर्भ में सुश्लोक सूत्र भी देखिये-   
                माल अंट में - ज्ञान कंठ में.
   
    दाम्पत्य जीवन में सुखी रहने के लिये छोटी दिखने वाली बडी बातें-
  
    जिन दम्पत्तियों का दामपत्य जीवन स्वस्थ होता है उनका पारिवारिक जीवन भी स्वस्थ व सुखी रहता है जिससे वे स्वयं ही नहीं बल्कि उनकी सन्तान भी स्वस्थ व सुखी रह पाती है । दाम्पत्य जीवन के स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखने के लिये कुछ छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर हमेशा बेहतर परिणाम हासिल किये जा सकते हैं-                           
 
     * सिर्फ अहम् भाव के कारण व अकारण अपने जीवन साथी की बात का विरोध न करें । पहले बात को पूरी समझने का प्रयास करें और बात यदि अच्छी लगे या सही लगे तो उसे सहज भाव से स्वीकार कर लें ।

    * जब तक बहुत जरुरी न हो पति को अपनी पत्नि के मायके वालों की निन्दा या उपहास नहीं  करना चाहिये बल्कि समय आने पर उनकी प्रशंसा व उनके घर आने पर उचित आवभगत करना चाहिये इससे गृहलक्ष्मी वास्तविक रुप से प्रसन्न रहती है ।

    * पति को पत्नि के साथ अपना व्यवहार ऐसा रखना चाहिये जिससे कि वह कभी हीन भावना से ग्रस्त न हो बल्कि उसका आत्मविश्वास बना रहे और उसके मन में यह भावना कायम रहे कि वह अपने परिवार का उपयोगी अंग है और घर-परिवार में उसका अपना महत्व है, मान-सम्मान है ।

    * परिवार से सम्बन्धित मामलों में पति को पत्नि से सलाह अवश्य लेना चाहिये जिससे कि वह अपने को कभी उपेक्षित न समझे । इसी प्रकार पत्नि को भी अपने पति से सलाह-मशविरा लेकर ही कोई काम करना चाहिये इससे दोनों के जीवन में सुमति और सौमनस्य कायम रहता है और अकारण वाद-विवाद व कलह की स्थिति निर्मित नहीं होती ।

    * जिन दम्पत्तियों में सुमति और सौहार्द्र वना रहता है वहाँ खुशहाली भी बनी रहती है इसके विपरित जहाँ कुमति और कलह रहती है वहां नाना प्रकार की विपत्तियां और तकलीफें भी बनी ही रहती हैं ।

      ब्रम्हपुराण में कहा गया है कि-
           दमपत्योः समता नास्ति यत्र-तत्र ही मन्दिरे, 
           अलक्ष्मीस्तत्र तत्रेव विफलं जीवनंतयो.
     अर्थात् जिस घर में पति-पत्नि में समता नहीं है वहाँ निर्धनता रहती है और उन दम्पत्ति का जीवन निष्फल हो जाता है ।

        नजीर अकबराबादी के इस शेर को देखिये-

        जो दीन में पूरे हैं वह    हर हाल में खुश हैं,
        हर काम में, हर दाम में, हर हाल में खुश हैं,
        गर माल दिया यार ने    तो माल में खुश हैं,
        बरबादी के भी हाल और   अहवाल में खुश हैं,
        भूख में और प्यास में,   तर माल में खुश हैं,
        पूरे हैं वही लोग जो      हर हाल में खुश हैं,

        जीने की नहीं पर्वाह,     मरने का नहीं गम,
        यकसां है उन्हे जिन्दगी   और मौत का आलम,
        वाकिफ न बरस से न  महिनों से वो इक दम,
        ना रात में मुश्किल है ना दिन का कभी मातम,
        दिन, रात, घडी, पहर, माहों साल में खुश हैं,
        पूरे हैं वही लोग जो     हर हाल में खुश हैं ।


शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निरन्तरता का महत्व. (लघुकथा)


       1.   किसी गांव में एक चरवाहा रहता था । वह नदी पर जब नहाने जाता तो अपने साथ अपने कंधे पर अपने से कई गुना भारी भैंस को उठा कर ले जाता और उसे अपने साथ नहलाकर वैसे ही कंधे पर उठाकर वापस घर लाता था । गांव के सभी लोग उसके इस क्रम से भली-भांति परिचित थे इसलिये उन्हें कोई आश्चर्य भी नहीं होता था । 

       एक बार किसी राजनेता के आगमन की पूर्व तैयारी करते उनके कुछ समर्थकों का उस गांव में आना हुआ । उन्होंने जब उस चरवाहे को इस तरह भैंस को कंधे पर उठाकर नदी तक जाते-आते देखा तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गये । उन्होंने उस चरवाहे से पूछा कि तुम्हारे वजन से कई गुना भारी इस भैंस को तुम इतनी आसानी से कंधे पर कैसे उठा पाते हो ? क्या तुम्हे इसमें कोई कठिनाई नहीं होती ? तब उस चरवाहे ने जवाब दिया कि कठिनाई तो होती है, लेकिन मेरे बचपन में मेरे पिताजी इसे बछडे के रुप में घर लाए थे और खेल-खेल में मैं तबसे ही इसे इसी तरह कंधे पर उठाकर तालाब तक नहलाने ले जाता था । जब इसका वजन मुझसे ज्यादा होता गया और मुझे इसे उठाने में कठिनाई हुई तो मेरे मन ने मुझसे कहा कि कल तो तुमने इसे उठाया था । बस यही एक सोच है जो रोज मुझे इस भैंस को मेरे कंधे पर उठा लेने में मेरे साथ चलती है कि कल तो मैंने इसे उठाया था तो आज क्यों नहीं ?

       2.    बारिश की कमी के कारण एक गांव में अक्सर जमीन के अनुपात में फसल नहीं उपज पाती थी जिसके चलते वहाँ के अधिकतर किसान या तो गांव छोडकर दूसरे गांव पलायन कर गये थे या फिर गरीबी के अभिशाप से त्रस्त जीवन गुजारने पर मजबूर रहते थे । जबकि उस गांव में बारिश की कमी का मुख्य कारण गांव की सीमा से सटा एक विशाल पर्वत था जिसकी चोटी से टकराकर बरसाती बादल उस गांव तक आने के पहले ही पर्वत के दूसरे छोर पर बरस जाते थे । 

       वहाँ के एक युवक ने इस समस्या से गांव को मुक्त करवाने की सोच के साथ हाथ में गेती उठा ली और एक सिरे से उस पर्वत को काटने के दुष्कर कार्य में जुट गया । रोज सुबह उठते ही वह अपने आवश्यक काम निपटाकर हाथ में गेती लेकर आ जाता और पहाड काटने के दुरुह अभियान में भिड जाता । 

       अब तो पर्वतराज को अपनी जान की चिंता सताने लगी । वे अपनी शिकायत लेकर भगवान के दरबार में पहुँचे और बोले- प्रभु इस युवक से मुझे बचाओ ये मुझे नेस्तनाबूद करने पर तुला है । भगवान को पर्वतराज की चिंता पर हँसी आ गई, वे बोले पर्वतराज तुम इतने विशाल आकार में होकर ये कैसी कायरों सी बात कर रहे हो । एक अदना सा आदमी छोटी सी गेती के बल पर तुम्हारा क्या बिगाड लेगा ? तो पर्वत भगवान से बोला- प्रभु आदमी अदना सा है, उसकी गेती भी छोटी सी है लेकिन उसके हौसले जितने बुलन्द हैं वो मुझे नेस्तनाबूद करने के लिये कम नहीं हैं । जब वो थक या मर जाएगा तो अपनी जगह अपने पुत्र को खडा कर जाएगा । मेरा विनाश तो तय है ।

       तो ये हैं निरन्तरता के चमत्कारिक परिणाम । जिसके आगे न भैंस का वजन कोई मायने रख पाता है और न ही पहाड की विशालता । 

       इसलिये जब आप अपने जीवन में किसी कठिन लक्ष्य को चुनौति की मानिन्द सामने रखकर उसे पूर्ण करने में तन-मन से जुट जाओगे तो कोई कारण नहीं है कि सफलता आपसे दूर रह सके ।

       इसी निरन्तरता का एक और कारनामा जो हम सभी जानते हैं वो है कोमल रस्सी के द्वारा कुएँ की पथरीली मुंडेर को घिस-घिसकर चीर देना । जिसके लिये कहा गया है-

                     करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान
                     रसरी आवत जात के, सिल पर पडत निशान.

        तो जब भी आपके समक्ष किसी कठिन कार्य की चुनौति दिखाई दे तो सिर्फ अपनी पूरी योग्यता और क्षमता के साथ उसे पूरा करने में भिड जाओ । देर-सवेर सफलता को आपके द्वार पर दस्तक देनी ही होगी । बस इतना अवश्य ध्यान रखना है कि-

  लक्ष्य जितना विशाल होगा  उसका रास्ता भी उतना ही लम्बा और बीहड मिलेगा ।” किंतु उसकी पूर्ति के बाद आपको मिलने वाला आर्थिक व मानसिक रिटर्न उससे कई गुना अधिक विशाल व आकर्षक  भी मिलेगा ।




इलाज...!

        एक महिला ने अपने पति का मोबाइल चेक किया तो फोन  नंबर कुछ अलग ही तरीके से  Save किये हुए दिखे, जैसे :-         आँखों का इलाज ...