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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

करत-करत अभ्यास के...


     किसी गांव में एक चरवाहा रहता था । वह नदी पर जब नहाने जाता तो अपने साथ अपने कंधे पर अपने से कई गुना भारी भैंस को उठा कर ले जाता और उसे अपने साथ नहलाकर वैसे ही कंधे पर उठाकर वापस घर लाता था । गांव के सभी लोग उसके इस क्रम से भली-भांति परिचित थे इसलिये उन्हें कोई आश्चर्य भी नहीं होता था । 

       एक बार किसी राजनेता के आगमन की पूर्व तैयारी करते उनके कुछ समर्थकों का उस गांव में आना हुआ । उन्होंने जब उस चरवाहे को इतनी वजनी भैंस को कंधे पर उठाकर नदी तक जाते-आते देखा तो वे सभी आश्चर्यचकित हो गये । उन्होंने उस चरवाहे से पूछा कि तुम्हारे वजन से कई गुना भारी इस भैंस को तुम इतनी आसानी से कंधे पर कैसे उठा पाते हो ?  क्या तुम्हे इसमें कोई कठिनाई नहीं होती ? तब उस चरवाहे ने जवाब दिया कि कठिनाई तो होती है, लेकिन मेरे बचपन में मेरे पिताजी इसे बछडे के रुप में घर लाए थे और खेल-खेल में मैं तबसे ही इसे इसी तरह कंधे पर उठाकर तालाब तक नहलाने ले जाता था । जब इसका वजन मुझसे ज्यादा होता गया और मुझे इसे उठाने में कठिनाई हुई तो मेरे मन ने मुझसे कहा कि कल तो तुमने इसे उठाया था । बस यही एक सोच है जो रोज मुझे इस भैंस को मेरे कंधे पर उठा लेने में मेरे साथ चलती है कि कल तो मैंने इसे उठाया था तो आज क्यों नहीं  ? यही होती है निरन्तर अभ्यास की ताकत.

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       2.    बारिश की कमी के कारण एक गांव में अक्सर जमीन के अनुपात में फसल नहीं उपज पाती थी जिसके चलते वहाँ के अधिकतर किसान या तो गांव छोडकर दूसरे गांव पलायन कर गये थे या फिर गरीबी के अभिशाप से त्रस्त जीवन गुजारने पर मजबूर रहते थे । जबकि उस गांव में बारिश की कमी का मुख्य कारण गांव की सीमा से सटा एक विशाल पर्वत था जिसकी चोटी से टकराकर बरसाती बादल उस गांव तक आने के पहले ही पर्वत के दूसरे छोर पर बरस जाते थे । 

       वहाँ के एक युवक ने इस समस्या से गांव को मुक्त करवाने की सोच के साथ हाथ में गेती उठा ली और एक सिरे से उस पर्वत को काटने के दुष्कर कार्य में जुट गया । रोज सुबह उठते ही वह अपने आवश्यक काम निपटाकर हाथ में गेती लेकर आ जाता और पहाड काटने के दुरुह अभियान में भिड जाता । 

       अब तो पर्वतराज को अपनी जान की चिंता सताने लगी । वे अपनी शिकायत लेकर भगवान के दरबार में पहुँचे और बोले- प्रभु इस युवक से मुझे बचाओ ये मुझे नेस्तनाबूद करने पर तुला है । भगवान को पर्वतराज की चिंता पर हँसी आ गई, वे बोले पर्वतराज तुम इतने विशाल आकार में होकर ये कैसी कायरों सी बात कर रहे हो । एक अदना सा आदमी छोटी सी गेती के बल पर तुम्हारा क्या बिगाड लेगा ? तो पर्वत भगवान से बोला- प्रभु आदमी अदना सा है, उसकी गेती भी छोटी सी है लेकिन उसके हौसले जितने बुलन्द हैं वो मुझे नेस्तनाबूद करने के लिये कम नहीं हैं । जब वो थक या मर जाएगा तो अपनी जगह अपने पुत्र को खडा कर जाएगा । मेरा विनाश तो तय है ।

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       ये हैं निरन्तर अभ्यास के चमत्कारिक परिणाम । जिसके आगे न भैंस का वजन कोई मायने रख पाता है और न ही पहाड की विशालता । 

       इसलिये जब आप अपने जीवन में किसी कठिन लक्ष्य को चुनौति की मानिन्द सामने रखकर उसे पूर्ण करने में तन-मन से जुट जाओगे तो कोई कारण नहीं है कि सफलता आपसे दूर रह सके ।

         इसी निरन्तरता का एक और कारनामा जो हम सभी जानते हैं वो है कोमल रस्सी के द्वारा कुएँ की पथरीली मुंडेर को घिस-घिसकर चीर देना । जिसके लिये कहा गया है-
करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान
रसरी आवत जात के, सिल पर पडत निशान.

        तो जब भी आपके समक्ष किसी कठिन कार्य की चुनौति दिखाई दे तो सिर्फ अपनी पूरी योग्यता और क्षमता के साथ उसे पूरा करने में भिड जाओ । देर-सवेर सफलता को आपके द्वार पर दस्तक देनी ही होगी । बस इतना अवश्य ध्यान रखना है कि-

         “लक्ष्य जितना विशाल होगा  उसका रास्ता भी उतना ही लम्बा और बीहड मिलेगा ।” किंतु उसकी पूर्ति के बाद आपको मिलने वाला आर्थिक व मानसिक रिटर्न उससे कई गुना अधिक विशाल व आकर्षक  भी अवश्य मिलेगा ।  
  

ऐतिहासिक शख्सियत...

पागी            फोटो में दिखाई देने वाला जो वृद्ध गड़रिया है    वास्तव में ये एक विलक्षण प्रतिभा का जानकार रहा है जिसे उपनाम मिला था...