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रविवार, 5 अप्रैल 2015

सुख की तलाश...!



ऐ सुख तू कहाँ मिलता है, क्या तेरा कोई स्थायी पता है,
क्यों बना बैठा है अन्जाना, आखिर कहाँ है तेरा ठिकाना ?

कहाँ-कहाँ ढूंढा तुझको, पर तू न मिला कहीं मुझको,
ढूंढता रहा ऊंचे मकानों में, बडे-बडे शोरुम व दुकानों में,
स्वादिष्ट मीठे पकवानों में, चोटी के बडे धनवानों में,
वो भी तुझको ढूंढ रहे थे, बल्कि मुझसे ही पूछ रहे थे ।

क्या आपको कुछ पता है, आखिर ये सुख रहता कहाँ है,
मेरे पास तो दुःख का पता है, जो सुबह-शाम मिलता रहता था ।
परेशान होकर रपट लिखवाई, पर ये कोशिश भी काम न आई,
उम्र अब  ढलान पर है, हौसले भी  थकान पर हैं ।

हाँ उसकी तस्वीर है मेरे पास, बची हुई है अब भी आस,
मैं भी हार नहीं मानूंगा, सुख के रहस्य को अवश्य जानूंगा ।
बचपन में मिला करता था, संग मेरे रहा करता था,
पर जबसे बडा मैं हो गया, सुख मुझसे जुदा हो गया ।

मैं फिर भी नहीं हुआ हताश, जारी रखी उसकी तलाश,
एक दिन जब आवाज ये आई, क्या मुझको ढूंढ रहा है भाई ।
मैं तेरे अन्दर छुपा हुआ हूँ, तेरे ही घर में बसा हुआ हूँ,
मेरा नहीं है कुछ भी मोल, सिक्कों में न मुझको तोल ।

मैं बच्चों की मुस्कानों में हूँ, संगीत की मधुर तानों में हूँ,
पत्नी के साथ चाय पीने में, परिवार के संग जीने में ।
माँ-बाप के आशीर्वाद में, रसोई घर के महाप्रसाद में,
बच्चों की सफलता में हूँ, माँ की निश्छल ममता में हूँ ।

हर पल तेरे संग रहता हूँ और अक्सर ही तुझसे कहता हूँ,
मैं तो हूँ बस एक एहसास, बंद करदे तू मेरी तलाश,
मिले उसी में कर संतोष, आज को जी, कल की कल सोच,
कल के लिये आज को न खो, मेरे लिये कभी दुःखी न हो 

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

बुधवार, 25 मार्च 2015

जिन्दगी का सफर



ऐ दोस्त तू जिन्दगी को जी,
उसे समझने की कोशिश न कर.

सुन्दर सपनों के ताने-बाने बुन,
उसमें उलझने की कोशिश न कर.

चलते वक्त के साथ तू भी चल,
उसमें सिमटने की कोशिश न कर.

अपने हाथों को फैला, खुलकर सांस ले,
अंदर ही अंदर घुटने की कोशिश न कर.

मन में चलते .युद्ध को विराम दे,
खामखां खुदसे लडने की कोशिश न कर.

कुछ बातें भगवान पर छोड दे,
सब-कुछ खुद सुलझाने की कोशिश न कर.

जो मिल गया उसी में खुश रह,
जो सकून छीन ले, उसे पाने की कोशिश न कर.

रास्ते की सुंदरता का लुत्फ उठा,
मंजिल तक जल्दी पहुँचने की कोशिश न कर.

सोमवार, 23 मार्च 2015

अकल बडी या भैंस...

महामूर्ख दरबार में, लगा अनोखा केस
फँसा हुआ है मामला, अकल बडी या भैंस.
अकल बडी या भैंस, दलीलें बहुत सी आई
महामूर्ख दरबार की, देखो अब सुनवाई.
मंगल भवन अमंगल हारी, भैंस सदा ही अकल पे भारी.
भैंस मेरी जब चर आये चारा, पांच सेर हम दूध निकारा.
कोई अकल ना यह कर पाये, चारा खाकर दूध बनावे.
अकल घास जब चरने जावे, हार जावे नर, अति दुःख पावे.
भैंस का चारा लालू खायो, बीबी को सी.एम. बनवायो.
मोटी अकल मन्दमति होई, मोटी भैंस दूध अति होई.
अकल इश्क कर-करके रोये, भैंस का कोई बायफ्रेंड न होये.
अकल तो ले मोबाईल घूमे, एस.एम.एस. पा-पा के झूमे.
भैंस मेरी डायरेक्ट पुकारे, कबहुँ मिस्ड काल ना मारे.
भैंस कभी सिगरेट ना पीती, भैंस बिना दारु के जीती.
भैंस कभी ना पान चबाय, ना ही इसको ड्रग्स सुहाय.
शक्तिशाली, शाकाहारी, भैंस हमारी कितनी प्यारी.
अकलमंद को कोई ना जाने, भैंस को सारा जग पहचाने.
जाकि अकल में गोबर होये, सो इन्सान पटक सर रोये.
मंगल भवन अमंगल हारी, भैंस का गोबर अकल पे भारी.
भैंस मरे तो बनते जूते, अकल मरे तो पडते जूते.
WhatsApp  प्रसारण  से साभार...

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

सुख की दुश्मन : ईर्ष्या.



बहुत पहले की बात है – किसी गांव में एक गरीब किसान रहता था, उसके पास एक छोटा सा खेत था जिसमें सब्जियां उगाकर वह अपना व परिवार का पेट पालता था । गरीबी के कारण उसके पास धन की हमेशा कमी रहती थी । स्वभावतः वह बहुत ईर्ष्यालु स्वभाव का था इस कारण उसकी अडौसी-पडौसी व रिश्तेदारों से बिल्कुल नहीं निभती थी । किसान की उम्र ढलने लगी थी अतः उसे खेत पर काम करने में बहुत मुश्किले आती थी । खेत जोतने के लिये उसके पास बैल नहीं थे, सिंचाई के लिये वर्षा पर निर्भर रहना पडता था, खेत में या आस-पास कोई कुआँ भी नहीं था जिससे वह अपने खेतों की सिंचाई कर पाता ।

     एक दिन वह थका-हारा अपने खोत से लोट रहा था । उसे रास्ते में सफेद कपडों में सफेद दाढी वाला एक बूढा मिला । बूढा उससे बोला – क्या बात है भाई, बहुत दुःखी जान पडते हो ? किसान बोला – क्या बताऊँ बाबा, मेरे पास धन की बहुत कमी है । यदि मेरे पास एक बैल होता तो मैं खेत की जुताई, बुआई और सिंचाई का सारा काम आराम से कर लेता । बूढा बोला – अगर तुम्हें एक बैल मिल जाए तो तुम क्या करोगे ? तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा, मेरी खेती का सारा काम बहुत आसान हो जाएगा । पर बैल मुझे मिलेगा कहाँ से ? किसान बोला ।

     मैं आज ही तुम्हें एक बैल दिए देता हूँ, यह बैल अपने घर ले जाओ और घर जाकर अपने पडौसी को मेरे पास भेज देना, बूढे ने कहा । किसान बोला – आप मुझे बैल दे रहे हैं यह जानकर मुझे बहुत खुशी हो रही है । किन्तु आप मेरे पडौसी से क्यों मिलना चाहते हैं ? बूढा बोला अपने पडौसी से कहना कि वह मेरे पास आकर दो बैल ले जाए ।

     बूढे की बात सुनकर किसान को भीतर ही भीतर क्रोध आने लगा, वह ईष्या के कारण जल-भुन कर रह गया । वह बूढे से बोला – आप नहीं जानते कि मेरे पडौसी के पास सब-कुछ है । यदि आप मेरे पडौसी को भी दो बैल देना चाहते हैं तो मुझे तुम्हारा एक बैल भी नहीं चाहिये ।

     बूढे ने तत्काल बैल को अपनी ओर वापस खींच लिया और कहा – क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है ? तुम्हारी समस्या गरीबी नहीं बल्कि ईर्ष्या है । तुम्हें जो कुछ मिल रहा है, यदि तुम उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते और पडौसियों व रिश्तेदारों की सुख-सुविधा से ईर्ष्या न करते तो शायद संसार में सबसे सुखी इन्सान बन जाते ।

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