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इस ब्लाग परिवार के हमारे सदस्य साथी....

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

बंटवारा (बोधकथा)

          पूर्व समय में शाम के झुरमुटे में शिकार से वापसी के दौरान किसी राज्य के राजा जब अपनी सेना से आगे-पीछे होने के कारण अकेले वापस आ रहे थे तब उन्होंने एक लकडहारे को अपनी बांसुरी की धुन में मगन गांव की ओर जाते हुए देखा । सामान्य बातचीत में राजा ने जब उससे यह पूछा कि उसकी आमदनी क्या  है और कैसे उसका गुजारा चलता है तो लकडहारा बोला- महाराज मैं चार मुद्राएँ रोज कमा लेता हूँ और उनमें से एक मुद्रा कुएं में फेंक देता हूँ, दूसरी मुद्रा मैं कर्ज में चुका देता हूँ, तीसरी मुद्रा को मैं उधार दे देता हूँ, और चौथी जमीन में गाड देता हुँ । राजा को उस लकडहारे के अपनी कमाई को उपयोग में लाने का यह तरीका समझ में नहीं आया लेकिन बात आगे बढने  के पूर्व ही उनका सेनापति अपने सैनिकों के साथ राजा को खोजते हुए उनके करीब आ गया और राजा अपने लश्कर के साथ अपने राज्य में वापस आ गये ।

          दूसरे दिन दरबार में राजा ने अपने सभी दरबारियों से लकडहारे के अपनी आमदनी को खर्च करने के इस तरीके का मतलब समझाने को कहा तो सभी विद्वान दरबारी इसका कोई भी संतोषप्रद उत्तर नहीं दे पाये । तब राजा ने सैनिकों को भेजकर उस लकडहारे को राज्य में बुलवाया और सभी दरबारियों के समक्ष अपनी कमाई की उन चार मुद्राओं के उपयोग के तरीके को विस्तार से समझाने को कहा तब लकडहारे ने अपनी आमदनी के उपयोग का तरीका बताते हुए कहा-

          महाराज पहली मुद्रा मैं कुएं में फेंक देता हूँ याने अपने परिवार के भरण-पोषण के काम में लाता हूँ, दूसरी मुद्रा से मैं कर्ज चुकाता हूँ याने मेरे माता पिता जिन्होंने मेरे जन्म से लगाकर मेरे जीवन में स्थापित होने तक मेरे लिये लगातार मेहनत की उनकी वृद्धावस्था में होने वाली सभी समस्याओं को दूर करने में काम में लाता हूँ, तीसरी मुद्रा मैं उधार दे देता हूँ याने अपने बच्चों की उचित शिक्षा-दिक्षा के काम में लाता हूँ और चौथी मुद्रा जिसे मैं जमीन में गाड देता हूँ अर्थात धर्म व समाज से जुडी वो सभी जिम्मेदारियां जहाँ मेरे योगदान की आवश्यकता होती है उस जगह उसका उपयोग कर लेता हूँ ।

          राजा के साथ ही सभी दरबारी भी लकडहारे के द्वारा अपनी आमदनी के बंटवारे के इस सूझ-बूझ पूर्ण उत्तर से अत्यन्त प्रभावित हुए और राजा ने भरपूर ईनाम के साथ ससम्मान उस लकडहारे को राजदरबार से विदा किया ।





रविवार, 30 अक्तूबर 2011

चित्र-15. ब्लागर कल के....



रोटी-कपडे बाद में, लेपटाप पर साथ में.

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

चित्र-14.. मेरे दिल में आज क्या है ?



हम तुम दोनों जब मिल जाएँगे,
एक नया इतिहास बनाएँगे ।
चित्र सौजन्य- Arif C

रविवार, 21 अगस्त 2011

मैं अण्णा हजारे नहीं हूँ.



          कम समय में अपनी आवश्यकताओं की अधिक से अधिक पूर्ति करने की चाह में आगे बढकर शासकीय सेवकों के साथ ही किसी भी अधिकार सम्पन्न व्यक्ति को अपनी तरफ से आफर देकर रिश्वत देने की पहल करने वाले हम अण्णा हजारे कैसे हो सकते हैं, कदम-कदम पर रिश्वत ले-देकर जरुरतमन्दों का हक अनाधिकृत रुप से कब्जिया लेने वाले अण्णा हजारे कैसे हो सकते हैं या फिर कानून के उल्लंघन के किसी भी ज्ञात-अज्ञात प्रकरण से फंसे हुए व्यक्ति या उसके परिवार को अन्तिम सीमा तक चूस लेने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देने वाले जननेता या जनसेवक अण्णा हजारे कैसे हो सकते हैं ? किन्तु इस समय देश भर में शहर, गांव, गली, मोहल्ले सभी ओर ऐसे दिग्गजों की भीड "मैं अण्णा हजारे हूँ" की टोपी लगाकर घूमते-दिखते बढती ही जा रही है । जिधर दम उधर हम की तर्ज पर घूम रहे ऐसे विशिष्टजन  अण्णा के इस आंदोलन में भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी हिस्सेदारी दर्शाकर शायद अपनी छबि को चमका लेने के प्रयास में भी लगे दिख रहे हैं ।
 
          
          निश्चय ही कदम-कदम पर मजबूरी में रिश्वत देने वाले पीडित नागरिकों के हितों की रक्षा के लिये ही यह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अण्णा के नेतृत्व में चल रहा है और इसमें जो जनसमर्थन इसे मिल रहा है उसमें उत्तरोत्तर वृद्धि हो यह सत्ताधारियों के साथ ही अधिकारसम्पन्न शासकीय सेवकों के यह समझने के लिये आवश्यक भी है कि आप जनता के मालिक नहीं हो किन्तु इसके लिये भ्रष्टाचार में चाहे-अनचाहे सहयोग देने वाले किसी भी व्यक्ति का किसी भी रुप में यह दर्शाना कि मैं अण्णा हजारे हूँ समझ के बाहर है । अण्णा की व्यक्तिगत जरुरतें कम हैं इसलिये उनके संकल्प में बहुत दम है और वे खुलेआम प्रशासन को ये चुनौति दे सकते हैं कि "यदि मेरे खिलाफ आप 100/- रु. का भी भ्रष्टाचार साबित कर दें तो मैं अपना यह अभियान बन्द कर दूंगा" किन्तु मैं अण्णा हजारे हूँ कि टोपी लगाकर घूमने वाले ये समर्थक भी क्या इतने ही निश्चय के साथ किसी से भी इस चुनौतिपूर्ण शैली में बात कर सकते हैं यकीनन नहीं ।
          
          तो फिर मेरा तो यह कहना है कि मैं अण्णा हजारे नहीं हूँ बल्कि 
 
"मैं भी अण्णा के इस आंदोलन का समर्थक हूँ" ।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

हार्दिक शुभकामनाएँ...


15 अगस्त 2011

देश के 65 वें 

स्वाधीनता दिवस

के

शुभ अवसर पर

जिन्दगी के रंग

ब्लाग के 

सभी पाठकों,

समर्थकों व 

टिप्पणीकर्ता शुभचिन्तक मित्रों को 

हार्दिक बधाईयां एवं शुभकामनाएँ...









मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तनाव का सामना


        ससुराल से पहली बार वापस आई बेटी अपनी माँ को ससुराल के बडे परिवार की समस्याओं के बारे में लगातार परेशान होकर बता रही थी कि मैं तो सबसे तालमेल बैठाते हुए परेशान हो चुकी हूँ । मैं कितनी भी कोशिश करुँ किसी न किसी को मुझसे शिकायत दिख ही जाती है । समझ मैं नहीं आता सबके साथ कैसे निबाह कर पाऊँगी ।
          किचन में बेटी की बात सुनते-सुनते माँ ने तीन बर्तनों में पानी भरकर आँच पर चढाया फिर एक बर्तन में गाजर डाली, दूसरे में एक अंडा डाला और तीसरे बर्तन में काफी के बीज डाल दिये । पन्द्रह-बीस मिनिट के बाद उसने तीनों बर्तनों को आँच से उतारकर एक-एक बर्तन को बेटी से जांचने को कहा । बेटी ने पहले गाजर को परखा, वह पानी में उबलकर बहुत नर्म हो गई थी । दूसरे बर्तन से अंडे के बाहरी आवरण को हटाकर देखा तो उसका अन्दर का तरल पदार्थ कठोर हो गया था । एकमात्र काफी थी जिस पर उस आंच का कोई असर नहीं हुआ बल्कि उसने पानी का रंग भी बदल दिया था और उस पानी में काफी की खुशबू भी आने लगी थी ।
 
          माँ ने बेटी को बताया- ये सभी चीजें समान स्थिति में गर्म पानी से होकर गुजरी हैं, लेकिन असर सब पर अलग-अलग हुआ है । तुम इनमें से किसके जैसी हो, गाजर जो वैसे तो कठोर दिखती है लेकिन बुरा समय आते ही नर्म पड जाती है, या अंडा जो गर्म पानी के कारण खुदको परिवर्तित कर लेता है, या फिर काफी की तरह हो जो गर्म पानी का भी रंग बदल सकती है । जैसे-जैसे पानी गर्म होता गया उसकी खुशबू भी चारों ओर फैलती चली गई ।
 
          बेटी को अपनी समस्याओं का समाधान मिल गया और वह नई उर्जा के साथ अपने ससुराल जाने की तैयारी करने लगी ।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

बडा कठिन है...




दानी होकर यश की इच्छा न होना,
 
प्रिय वचन बोलते हुए दान देना,
 
विद्वान होकर विद्या का अभिमान न करना, 
 
वीर होकर क्षमाशील होना,
 
सुन्दर स्त्री के चंचल नयनों के कटाक्ष से प्रभावित न होना, 
 
कटु वचन सुनकर भी उत्तेजित नहीं होना,
 
अवसर मिलने पर चरित्रभ्रष्ट न होना,
 
पराये धन का लालच न करना

और
 
युवा सुन्दर स्त्री का निरन्तर घर से बाहर रहने तथा पुरुषों के अधीन काम करके भी चरित्रभ्रष्ट न होना.
 
यह सब असम्भव नहीं तो भी अत्यन्त कठिन तो अवश्य ही है ।



सोमवार, 25 जुलाई 2011

सुखी कौन ? दुःखी कौन ??


सुखी कौन ? 

          एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा - गुरुदेव इस दुःखी संसार में सुखी कौन है ?
 
          गुरु ने जवाब दिया - वत्स ! जिसे किसी का एक पैसा भी कर्ज न चुकाना हो और शौच से निपटने में एक मिनिट से ज्यादा वक्त न लगता हो वही सुखी है ।
 
          शिष्य ने पूछा - ऐसा क्यों गुरुदेव तो गुरु बोले- ऐसा इसलिये कि कर्जदार न होगा तो मस्त और बेफिक्र रहेगा । कर्ज की चिन्ता से स्वास्थ्य खराब होता है और अपमानित भी होना पडता है । कहावत है कि औरत का खसम आदमी और आदमी का खसम कर्ज । इसी तरह जिसे शौच करते समय न तो इन्तजार करना पडे न जोर लगाना पडे और तत्काल खुलकर पेट साफ हो जाए उसकी पाचन शक्ति का क्या कहना ! इसलिये जिसकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो और तन भी स्वस्थ हो तो मन भी प्रसन्न रहेगा ही । बस ऐसा ही व्यक्ति सुखी होगा । 
 

दुःखी कौन ? 
 
लोकेषु निर्धनो दुःखी,  ऋणग्रस्तस्ततोsधिकम् ।
ताभ्याम् रोगमुक्ततो दुःखी, तेभ्यो दुःखी कुर्भायकः ।।
-विदुर नीति.
 
       संसार के दुःखियों में पहला दुःखी निर्धन है, उससे अधिक दुःखी वह है जिसे किसी का ऋण चुकाना हो, इन दोनों से भी अधिक दुःखी सदा रोगी रहने वाला मनुष्य है लेकिन इन सबसे ज्यादा दुःखी वह है जिसकी पत्नि या पति दुष्ट प्रवृत्ति का हो ।

          उपरोक्त श्लोक में दुःखी व्यक्ति की अलग-अलग किस्मे बताई गई है जो सही भी है किन्तु अनुभव में यह आया है कि जब तक हमें अपने लिये सुख की और दूसरे को दुःख देने की चाह और कोशिश रहेगी तब तक हम दुःखी ही रहेंगे । जैसा हम चाहें वैसा न हो और जैसा न चाहें वैसा हो यही दुःखों का मूल कारण है ।
निरोगधाम से साभार...

सोमवार, 27 जून 2011

जीवन सूत्र


सोचिये : जो भी मेरे पास है, मेरे लिये खास है.

हमारी तीन महत्वपूर्ण संपत्तियां हैं - 
 शरीर, संयम और आत्मविकास.
 
कोई भी काम सिर्फ काम चलाने के लिये नहीं बल्कि आगे बढने के लिये कीजिए.
 
यदि आप पूरी जिन्दगी के लिये खुशी चाहते हैं तो अपने काम से प्यार करना सीखिए.
 
असफलता वह अवसर है जब आप 
पूरी समझदारी से दोबारा शुरुआत कर सकते हैं.
 
 खुश रहना भी एक आदत है और लगन से मेहनत करना भी.
 
कोल्हू का बैल सारा दिन घूमता रहता है किन्तु रहता वहीं का वहीं है.
 
पढे-लिखे होने से अच्छा है पढते-लिखते रहना.
 
दलदल में रहोगे तो तैरना नहीं सीखोगे.
 
अपनी ख्वाईशों को पूरा करने की कोशिश जरुर कीजिये,
ताकि भविष्य में ये खेद न रहे कि आपने कोशिश ही नहीं की.

सीधी बातचीत मित्रता बनाये रखने का श्रेष्ठ तरीका है.
 
हर दिन की शुरुआत सुखद, संतुष्ट व सुखी नजरिए से कीजिये, 
आपका दिन सुखद व सफल गुजरेगा.
 
सौजन्य : अहा जिन्दगी (धर्मेन्द्र दकलिया, बीकानेर (राज.)

बुधवार, 8 जून 2011

अपनी- अपनी बारी...


          एक परिचित परिवार, पति-पत्नि और दो पुत्र । खाते-पीते संघर्षशील परिवार के मंध्यमवर्गीय पिता ने तीव्रबुद्धि पुत्रों की शिक्षा में लगन को देखते हुए बडे पुत्र को लगभग 10 लाख रु. खर्च करके डाक्टर बनवाया । छोटे-पुत्र को भी डाक्टर बनवाते शैक्षणिक खर्च सिर्फ छोटे पुत्र का ही 20 लाख तक पहुँच गया । इस दरम्यान पत्नि भी साथ छोड गई और दोनों बच्चों ने विवाह के बाद अपने-अपने अलग-अलग आशियाने बना लिये ।

          अब वृद्धावस्था की मार के साथ जितनी बीमारियां उतने ही कर्जों के भार से उस व्यक्ति की हालत दयनीय है । नाते-रिश्तेदार जब उन बच्चों से अपने पिता को सम्हालने के लिये कहते हैं तो दोनों ही पुत्रों का अलग-अलग किन्तु एक ही जवाब होता है - मुझे उनसे कोई बात नहीं करना, कोई रिश्ता नहीं रखना ।

          सम्भव है कि जमाने के साथ संघर्षशील मनोस्थिति में कभी चिडचिडाहट के दौरान एकाधिक बार उस व्यक्ति के द्वारा अपने बच्चों को डांट देने की स्थिति में ऐसा कुछ भी कभी कहने में आ गया हो जो इन बच्चों को सुनना बिल्कुल भी अच्छा न लगा हो किन्तु यदि ऐसा हुआ भी हो तो क्या इन स्थितियों में उन आर्थिक व सामाजिक रुप से सक्षम पुत्रों द्वारा अपने लगभग असहाय पिता के प्रति ये नजरिया उचित है ?  



        ऐसी ही स्थिति को ध्यान में रखकर राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी ने कभी कहा होगा - 

अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाकर उन्हें पर्याप्त योग्य अवश्य बनवाओ, 
किन्तु उन्हें इतना योग्य भी मत बनवा देना कि बडे होकर वो 
तुम्हें ही अयोग्य समझने लगें ।

रविवार, 22 मई 2011

रामभरोसे जो रहे...!


     एक समय हमारे एक मित्र जो मल्टीलेबल मार्केटिंग कंपनी में हमारे साथ काम करते थे उनके घर हमारा आना-जाना होता था । उनकी जीवनचर्या देखकर हम दूसरे मित्र आश्चर्यचकित रहा करते थे कि ये भाई कैसे काम करते हैं और आगे कैसे काम कर पावेंगे । दरअसल उनकी दिनचर्या में हम ये देखते कि सुबह 11.00 / 11.30 तक उनका नहाना धोना चलता । फिर उनके कमरे में जो बीसियों देवी-देवताओं की तस्वीरें लगी होती थीं उनकी पूजा-पाठ का दौर अगले एकाध घंटे चलता । फिर वे भोजन से निवृत्त होते और लगभग 1.00 बजे बाद उनके काम का समय चालू होता जो शाम के ठीक 5.00 बजे ठंडाई छानने के समय तक चलता । फिर एकाध घंटे हाथ से ठंडाई छानने का दौर और फिर साधु-संतों की सेवा चाकरी । शायद ही कभी उनका ये क्रम बिगडते हम मित्रों ने देखा होगा । हमारे लिये आश्चर्य करने वाली बात ये होती थी कि हम कई बार अपने काम को विस्तार देने के लिये सुबह 8.30 / 9.00 बजे से जुट जाते थे और रात्रि 9.30 / 10.00 बजे तक भी अपने काम से पीछे नहीं हटते थे । और हमारे इन मित्र की दिनचर्या... वाकई हमें आश्चर्यचकित करती थी । अब इनके बारे में बाद में...

        पिछले दिनों पुरातन काल की एक कहानी पढी- जिसमें आस्थावान संत अपने शिष्यों को ये शिक्षा दे रहे थे कि जब आप ईश्वर में अपना ध्यान लगाते हो तो ईश्वर भी हर परिस्थिति में आपका ध्यान रखते ही हैं । उनके एक जिज्ञासु लेकिन धार्मिक शिष्य ने जब पूछा कि यदि मैं अपने भोजन के लिये कोई उपक्रम न करुँ तो क्या ईश्वर मेरे लिये भोजन का इन्तजाम कर देंगे । अवश्य करेंगे, संत ने अपने शिष्य को आश्वस्त करते हुए कहा । शिष्य भी पूरी तरह से इस तथ्य का परीक्षण करने की मानसिकता में दूसरे ही दिन पास के जंगल में जाकर एक पेड की ऊंची शाख पर बैठकर ईश्वर की भक्ति में लग गया । जब भोजन का वक्त हुआ तो भूख के दौरान उसे फिर मन में संशय उत्पन्न हुआ लेकिन परीक्षा तो परीक्षा ठहरी । वो ठान कर बैठा रहा कि आज या तो ईश्वर मेरे लिये भोजन जुटाएंगे या फिर मैं भूखा ही रहूँगा ।

        कुछ समय और इसी उहापोह में गुजरा । अचानक राजा के मंत्री और सेनापति का अपने दो-चार सैनिकों के साथ उधर से निकलना हुआ । सेनापति ने मंत्री से भोजन वहीं कर लेने का आग्रह किया जिसे मंत्री ने स्वीकार कर लिया । घनी छांह देखकर उसी पेड के नीचे वे सभी भोजन करने बैठे । उन्होंने अपने भोजन के टिफीन खोले ही थे कि बिल्कुल नजदीक किसी शेर के दहाडने की आवाज सुनाई दी । जिसे सुनकर वे सभी राजकर्मी खाना छोडकर भाग खडे हुए । उनके जाने के बहुत देर बाद तक जब उनमें से कोई भी पलटकर वापस नहीं आया तो उस जिज्ञासु शिष्य ने सोचा कि ईश्वर ने यहाँ तक तो भोजन मेरे लिये भेज ही दिया है । क्या अब मुझे नीचे उतरकर ये भोजन कर लेना चाहिये ? लेकिन फिर उसके मन ने कहा कि नहीं यदि ईश्वर ने मेरे लिये ये भोजन जुटाया है तो उन्हें ही इसे मुझ तक भी पहुँचाना चाहिये । मैं नीचे क्यों उतरुँ ?

        तभी दूसरा संयोग बना और कहीं से भूखे-प्यासे डाकू भागते हुए उधर से निकले । वहाँ उन्हें कीमती पात्रों में भोजन रखा देखकर स्वयं की भूख मिटा लेने की इच्छा जागृत हुई, तभी  उनके एक साथी ने अपने सरदार को सचेत करते हुए कहा - सरदार ये कहीं हमारी गिरफ्तारी की कोई साजिश तो नहीं ? वर्ना इस घने जंगल में इस भोजन के यहाँ मिलने का क्या काम ? कहीं ये भोजन जहरीला न हो जिससे हम इसे खावें और या तो मर जावें या फिर बेहोशी के आगोश में गिरफ्तार कर लिये जावें । सरदार को भी अपने साथी की बात तर्कसंगत लगी, वो बोला यदि यह किसी की साजिश है तो निश्चय ही कोई भेदिया भी आसपास अवश्य छुपा होगा, पहले उसे ढूंढो । आनन-फानन में वृक्ष की ऊपरी चोटी पर बैठे जिज्ञासु शिष्य पर उनकी नजर पड गई । उन्होंने समवेत स्वर में सरदार को बताया कि वो उपर बैठा हैं । अब तो उन शिष्य को बडी घबराहट हुई उन्होंने चिल्लाकर कहा - भोजन में कोई जहर नहीं है । बिल्कुल साफ-सुथरा भोजन है । तब तक तो दो डाकू एक टिफीन उठाकर ऊपर चढ गये और उस जिज्ञासु शिष्य को कहा पहले तुम हमारे सामने ये भोजन करो । जिज्ञासु शिष्य भूखा तो बैठा ही था उन डाकुओं के आतिथ्य में उसने भरपेट भोजन किया और डाकुओं के भोजन करके निकल जाने के बाद अपने गुरु के पास जाकर अपना अनुभव बताया कि किस प्रकार आज ईश्वर ने मेरे लिये भोजन की व्यवस्था की ।

        अब बात पुनः उन धार्मिक आस्थावान मित्र के सन्दर्भ में - हम सभी मित्र जो 12-13 घंटे रोज तन्मयता से अपना कार्य करते वे सभी औसत जीवन स्तर से उपर शायद नहीं पहुँचे लेकिन मात्र 4 घंटे रोजाना काम करने वाला हमारा वो मित्र कालान्तर में प्रापर्टी ब्रोकर बनकर किसानों की जमीनों के सौदे करके और उन्हें कालोनाईजरों को बेच देने के काम में लगकर करोडपति बन गया । साधु संतों की सेवा करते एक बडा सा मंदिर भी उसने अपनी आस्था के चलते बनवा दिया और आज तक भी उसकी दिनचर्या में शायद ही कोई बदलाव आ पाया हो । उसके साथ के हम सभी मित्र बेशक अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित भी हुए और अपने प्रयासों के दायरे में आर्थिक रुप से उन्नत भी हुए किन्तु उस चार-पांच घंटे रोज काम करने वाले मित्र की हैसियत की बराबरी हमारे उस समय के पूरे सर्कल में कोई भी आज तक तो नहीं कर पाया ।

        अब इसे ईश्वर की कौनसी व्यवस्था का नाम दिया जावे - 

शायद रामभरोसे जो रहे पर्वत पर हरीयाए...  इसी को कहते हों ।


बुधवार, 11 मई 2011

विषतुल्य और विषम परिस्थिति.


        संसार का कोई भी पदार्थ अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता, उसका अच्छा या बुरा होना, हितकारी या अहितकारी होना या लाभकारी या हानिकारक होना उसके उपयोग, उपयोग के उद्देश्य और उसके परिणाम पर निर्भर होता है । उचित युक्ति और मात्रा के साथ प्रयोग करने पर जहर भी औषधि का काम करता है, जबकि अनुचित मात्रा में किया गया स्वादिष्ट भोजन भी विष (फूड पाईजन) का काम करता है । हमारे जीवन में कुछ ऐसी विषम परिस्थितियां निर्मित होती हैं जो विष के समान हानिकारक सिद्ध होती हैं । ऐसी कुछ स्थितियां ये भी हैं-

 घी और शहद समान मात्रा में मिलने पर विषतुल्य हो जाते हैं । 

 खाया हुआ आहार ठीक से न पचने पर विषतुल्य हो जाता है ।

 वृद्ध पुरुष के लिये युवा पत्नी विषतुल्य हो जाती है । 

 कटु वचन बोलने से वाणी विषतुल्य हो जाती है । 

 विद्यार्थी के लिये आलस्य विषतुल्य हो जाता है । 

 तरुणी विधवा के लिये कामवासना विषतुल्य हो जाती है । 

 पत्नी के लिये नपुंसक पति विषतुल्य हो जाता है । 

 कुलटा और कर्कश पत्नी पति के लिये विषतुल्य हो जाती है । 

 भोगविलास में अति स्त्री-पुरुष के लिये विषतुल्य हो जाती है । 

 अवज्ञाकारी व मूर्ख पुत्र,  पिता के लिये विषतुल्य हो जाता है । 

 कर्ज लेते रहने वाला व्यसनी पिता सन्तान के लिये विषतुल्य हो जाता है ।

 मूढ और आलसी शिष्य गुरु के लिये विषतुल्य हो जाता है । 

 निर्धन के लिये महत्वाकांक्षाएं विषतुल्य हो जाती हैं । 
  
और...

 अति करना सभी जगह विषतुल्य ही साबित होता है ।



मंगलवार, 3 मई 2011

अनमोल बोल - 4. सुनने की आदत.

        
          सुनने की आदत डालो, क्योंकि दुनिया में कहने वालों की कमी नहीं है । कडुवे घूंट पी-पीकर जीने और मुस्कराने की आदत बना लो क्योंकि दुनिया में अब अमृत की मात्रा बहुत कम रह गई है । अपनी बुराई सुनने की खुदमें हिम्मत पैदा करो क्योंकि लोग तुम्हारी बुराई करने से बाज नहीं आएंगे । आलोचक बुरा नहीं है बल्कि वही तो जिंदगी के लिये साबुन-पानी का काम कर रहा है । आखिर जिन्दगी की फिल्म में खलनायक भी तो जरुरी है ।
मुनि श्री तरुण सागर जी.




बुधवार, 27 अप्रैल 2011

गर भला किसी का कर ना सको तो....

गर भला किसी का कर ना सको तो बुरा किसी का मत करना,
अमृत न पिलाने को हो घर में तो जहर पिलाते भी डरना ।

यदि सत्य मधुर न बोल सको तो झूठ कटुक भी मत कहना
गर मौन रखो सबसे अच्छा, विष-वमन कहीं भी मत करना,
यदि घर ना किसी का बना सको तो झोपडिया न जला देना
यदि मरहम पट्टी कर न सको तो खार नमक न लगा देना

जब दीपक बनकर जल न सको तो अन्धकार भी मत करना
जब फूल नहीं बन सकते तो, कांटे बनकर भी बिखरना ना,
मानव बनकर सहला न सको तो दिल भी किसी का दुखाना ना
यदि देव नहीं बन सकते तो दानव बनकर भी दिखाना ना ।

यदि सदाचार अपना न सको तो दुराचार भी मत करना.
गर भला किसी का कर ना सको तो बुरा किसी का मत करना ।



शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

होनहार...

       अति व्यस्त व्यापारी पिता ने अपने युवा हो रहे पुत्र को हमउम्र दोस्तों में कुछ ज्यादा ही रुचि लेते देखा तो यह जानने की कोशिश में कि अपने दोस्तों के साथ इस उम्र में यह लडकियों में रुचि ले रहा है या ड्रिंक जैसे व्यसन में उलझ रहा है या फिर व्यापार में पैसे कमाने की ओर भी इनका रुझान चल रहा है, उसके घर आने के समय एकान्त कमरे में मेज पर सुन्दर लडकी की फोटोफ्रेम के साथ व्हिस्की की बाटल और नोटों की एक गड्डी रख दी और छुपकर उसकी गतिविधि को देखने लगा ।





      पुत्र ने कमरे में घुसते ही Wou की मुद्रा में सिटी बजाते हुए लडकी के फोटो को उठाकर उसका चुम्बन लिया फिर बाटल खोलकर एक बडा सा घूंट व्हिस्की का मुंह में भरा और नोटों की गड्डी को जेब के हवाले करते हुए कमरे से बाहर निकल गया ।


रविवार, 17 अप्रैल 2011

चतुर नौनिहाल...!



        हमारे तीन वर्षीय पोते मा. हनी जिनके जन्मदिन पर कुछ दिनों पूर्व आप सभीने शुभकामनाएँ भेजी थीं दो दिन पूर्व अपने चाचा के साथ घूमने निकले । एरोड्रम घर से बमुश्किल एक किलोमीटर से भी कम की ही दूरी पर है और घूमने के दौरान एरोप्लेन को बहुत नीचे से देखने की उनकी हसरत अक्सर पूरी हो जाती है किन्तु उस दिन प्लेन की आवाजाही का दूर-दूर तक नामो निशान नहीं दिख रहा था और हनी मास्टर जिद पर अडे थे कि एलोप्लेन बुलवाओ । 

         चाचा ने जब पांसा डाला कि अब तुझे प्लेन देखना है या आईस्क्रीम खाने चलना है तो जनाब पूरी मासूमियत से बोलते हैं "वा तो फिल अबी आईस्क्लीम खाने चलते हैं एलोप्लेन देखने बाद में आ जाएँगे ।"

                  ऐसे ही हमारे पडौसी के चार वर्षीय पोते के यहाँ एक दिन उनकी मम्मी को किटीपार्टी में जाना था और दादी को एक शादी में । उनसे पूछा गया कि मम्मी के साथ जाना है या दादी के साथ तो वे तपाक से बोले दादी के साथ । जब उनके पापा ने पूछा आज दादी के साथ क्यों मम्मी के साथ क्यों नहीं ? तो जनाब फरमाते हैं किटीपार्टी में तो एक बार ही कोल्डड्रिंक मिलेगी और शादी में तो कितनी भी बार मैं कोल्डड्रिंक पीने के साथ मिठाई भी खा सकूँगा ।


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

श्री महावीर वाणी




  
जियो और जीने दो...




महावीर जयन्ति के पावन पर्व पर

  सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएँ...


बुधवार, 13 अप्रैल 2011

जीवन चक्र !...



स्त्री काकरोच से डरती है
 
काकरोच चूहे से डरता है
 
चूहा बिल्ली से डरता है

बिल्ली कुत्ते से डरती है
 
कुत्ता आदमी से डरता है

आदमी स्त्री (पत्नी) से डरता है.


इसी वर्तुल में घूम रही इस गोल दुनिया में सभी अपनी जीवन यात्रा के दायरे में अनवरत घूम रहे हैं ।

चिन्तन सौजन्य-
राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी महाराज

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

तर्क और तकरार...



         संत कबीर के बारे में यह धारणा आम थी की उनका दाम्पत्य जीवन बहुत सुखी है और उन पति-पत्नी के बीच कभी झगडा नहीं होता है । 
 
        एक जिज्ञासु इसका राज जानने कबीर के पास पहुँचे और उनसे अपनी जिज्ञासा जाहिर की- मैंने सुन रखा है कि आपका अपनी पत्नी के साथ कभी कोई अनबन या झगडा नहीं होता है । आखिर ऐसा कैसे सम्भव है ?

        कबीर ने उन सज्जन को बैठाकर अपनी पत्नी को आवाज दी और उससे कंडील जलाकर लाने को कहा- पत्नी ने कंडील जलाकर वहाँ लाकर रख दिया । तब कबीर ने पत्नी से उन मेहमान को पिलाने के लिये पानी मंगवाया. पत्नी ने पीने का पानी लाकर भी दे दिया जिसे कबीर ने उन आगन्तुक महोदय को पिलाने के बाद उनसे पूछा- मैंने आपको हमारे बीच तकरार नहीं होने का कारण बता दिया है । उम्मीद है आपको भी इससे लाभ हो सकेगा ।
 
        जिज्ञासु आगंतुक विस्मित मुद्रा में कबीर से बोला- कहाँ ? अभी तक तो आपने मेरे प्रश्न का कोई उत्तर ही नहीं दिया । मैं कैसे समझ सकता हूँ कि आप क्या समझाना चाहते हैं ।
 
        तब कबीर ने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए उन्हें बताया- इस समय शाम शुरु हो रही है और रात का अंधेरा होने में अभी कई घंटे बाकि है । ऐसी स्थिति में जब मैंने अपनी पत्नी से कंडील जलाकर लाने को कहा तो उसने मुझसे कोई पूछताछ या तर्क नहीं किया कि इस समय मैं जलते हुए कंडील का क्या करुंगा ? बस मैंने मांगा और उसने लाकर दे दिया ।

         वैसे ही यदि वह मुझसे किसी काम के लिये बोलती है तो मैं भी बिना किसी तर्क के उसका बताया हुआ काम कर देता हूँ और जब हमारे बीच में अकारण के तर्क या ऐसा क्यूं जैसी कोई पूछताछ नहीं चलती तो फिर किसी प्रकार की तकरार का  भी कोई कारण हमारे बीच नहीं रहता और इसीलिये लोगों को हमारा दाम्पत्य जीवन सुखी दिखता है


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

श्री अण्णा हजारे और जन लोकपाल बिल



      श्री अण्णा हजारे 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान सेना में सैनिक थे । युद्ध के दौरान उनकी पूरी यूनिट में वे एकमात्र सैनिक थे जो जीवित बचे । उन्होंने अपने इस पुर्नजीवन को भगवान की देन समझा और पूरा जीवन समाज की सेवा के लिये समर्पित कर दिया । उन्होंने शादी नहीं की और वे एक मंदिर में जीवन बिताते हैं । उनके नाम न कोई बैंक बैलेन्स है और न ही कोई जमीन । कुछ जोडी कपडे के अलावा उनकी कोई सम्पत्ति नहीं है । 

      श्री अण्णा हजारे महाराष्ट्र में गरीब लोगों के हितों की रक्षा करने के लिये कई बार आमरण अनशन पर बैठे हैं और उनके अनशन की वजह से महाराष्ट्र सरकार को 6 भ्रष्ट मंत्रियों व 400 अफसरों को बर्खास्त करना पडा और महाराष्ट्र में सूचना अधिकार कानून समेत 7 कानून पारित किये गए । यह उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि आज महाराष्ट्र के कई गांव जहाँ कभी सूखा हुआ करता था वहाँ आज हरियाली है, खाद्य सम्पदा है ।

      ये वही अण्णा हजारे हैं जिन्होंने देश में भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिये सूचना का अधिकार बनवाया और अब यही अण्णा हजारे भ्रष्टाचारियों से लडने के लिये जन लोकपाल रुपी हथियार के लिये  संघर्ष कर रहे हैं । जनलोकपाल लागू होगा तो देश से भ्रष्टाचार का उन्मूलन होने के साथ ही ईमानदार लोगों को सिर उठाकर जीने का अधिकार मिलेगा । देश फिर से वैभवशाली, गरीबीमुक्त, भुखमरीमुक्त, अपराधमुक्त और बेरोजगारी से मुक्त हो सकेगा ।

जन लोकपाल बिल
      जस्टिस संतोष हेगडे, प्रशांत भूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी व अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों द्वारा बनाया गया यह विधेयक जनता के द्वारा वेबसाईट पर दी गई प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार-विमर्श के बाद विधि-विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया है । इस बिल को शांति भूषण, जे. एम. लिंगदाह, अन्ना हजारे, श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव, महमूद मदानी, आर्क बिशप विन्सेन्ट एम. कान्सेसाओ, सैयद रिजवी, जस्टिस डी. एस. तेवटिया, प्रदीप गुप्ता, कमलकान्त जायसवाल, सुनिता गोदारा, सैय्यद शाह, फजलुर्रहमान वाईजी आदि का समर्थन प्राप्त है । इस बिल की प्रति प्रधानमंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजी गयी थी, जिसका उन्होंने इस अनशन के पूर्व तक कोई जवाब नहीं दिया ।

इस कानून में क्या है ?

        1.  इस कानून के अन्तर्गत केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा ।

        2. ये संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी । कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा ।

        3. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लंबित नहीं रहेंगे । किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी । ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को दो साल के भीतर जेल भेजा जावेगा ।

        4. अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों के द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जावेगा ।

        5. ये आम आदमी की कैसे मदद करेगा ?

              यदि किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा और वह मुआवजा शिकायतकर्ता को मुआवजे के रुप में मिलेगा ।

        6. अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के अन्दर नहीं बनते हैं, या  पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महिने के भीतर करवाना होगा । आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं जैसे- सरकारी राशन की कालाबाजारी, सडक बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग, लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर करनी होगी ।

        7. क्या सरकार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी ?

              ये मुमकिन नहीं है क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन जजों, नागरिकों और संवेधानिक संस्थानों द्वारा किया जावेगा न कि नेताओं द्वारा । इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी ।

        8. अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाये गये तो ?

              लोकपाल / लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह से पारदर्शी होगा । लोकपाल के किसी भी क्रमचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महिने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जावेगा ।

        9. मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा ?

              सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सी बी आई की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग को लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा । लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिये पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी ।


         अब पिछले तीन दिनों से चल रहे अण्णा के इस अनशनकारी आंदोलन के समर्थन में देश भर से जैसे-जैसे सैकडों हजारों से होते हुए लाखों देशवासियों का जुडाव बढता जा रहा है सरकार को अपना अस्तित्व खतरे में दिखने लगा है । आंदोलनकारियों को येन-केन मना लेने के आधे-अधूरे शासकीय प्रयास सामने आ रहे हैं । जबकि आज आवश्यकता इस बात की दिख रही है सार्वजनिक जीवन में महाभ्रष्ट लोगों के अपराध का शीघ्र निर्णय होने के साथ ही उन्हें उनकी कारगुजारियों की समय पर उपयुर्क्त सजा मिलने के लिये देश में यह कानून अविलम्ब लागू हो सके ।



मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

लघुकथा : मितव्ययता - फिजूलखर्ची और राजा का न्याय !

      एक परिवार में दो भाई साथ में रहते थे । पिता की मृत्यु के बाद दोनों भाईयों में सम्पत्ति का बंटवारा हो गया और दोनों अपना-अपना काम व अपनी-अपनी गृहस्थी में रहने लगे । बडे भाई की पत्नी जितनी तेज-तर्रार थी उतनी ही कामचोर होने के साथ फिजूलखर्च भी थी,  जबकि छोटे भाई की पत्नी मेहनती स्वभाव के साथ मितव्ययता से जीवन जीने की प्रवृत्ति में यकीन रखती थी ।

          दोनों देवरानी व जेठानी की इन अलग-अलग प्रवृत्तियों के कारण थोडे ही समय में दोनों भाईयों की आर्थिक स्थितियों में असमानता बढने लगी । छोटे भाई के परिवार की बढती समृद्धि देखकर बडे भाई की पत्नी रोज अपने पति से शिकायत करती कि बंटवारे में हमारे साथ धोखा हुआ है और तुम्हारे छोटे भाई ने अधिक धन-सम्पत्ति अपने कब्जे में ऱखली है । इसलिये तुम्हें राजा के पास जाकर उनसे शिकायत करने के साथ ही अपने लिये न्याय मांगना चाहिये ।

           रोज-रोज की एक ही बात, कब तक असर न करती । आखिर बडा भाई अपनी पत्नी को साथ लेकर शिकायत करने राजा के पास पहुँचा । राजा ने उनकी शिकायत सुनकर छोटे भाई को भी अपनी पत्नी सहित राज-दरबार में बुलवाया । जब राजा के सामने दोनों महिलाओं की स्वभावगत कमी के कारण बने इस आर्थिक असंतुलन की बात आई तो बडे भाई की पत्नी ने इस कारण को गलत बताते हुए छोटे भाई व उसकी पत्नी को बेईमान साबित करते हुए उनके द्वारा बेईमानी से धन हडपे जाने की शिकायत फिर की ।

      फैसला आसान न था अतः राजा ने मंत्री से सलाह-मशवरा कर दोनों महिलाओं को दूसरे दिन सुबह तालाब से एक-एक घडा  बाल्टी पानी इस आदेश के साथ लाने को कहा कि पानी ढूलना नहीं चाहिये । दूसरे दिन दोनों देवरानी व जेठानी नियत समय पर पानी का घडा व बाल्टी तालाब से भरकर राजमहल तक पहुँची । दोनों ही महिलाओं से कीचड सने रास्तों पर नंगे पैर चलवाते हुए अलग-अलग यह पानी मंगवाया गया था । जेठानी अपना पानी पहले लेकर पहुँच गई जिसमें जल्दबाजी के कारण राजा के आदेश के बाद भी छलकने से पानी कम हो चुका था । फिर सेवक ने जेठानी के पैर धोकर साफ करने के लिये एक लोटा पानी उसे दिया जिसे उसने पैरों पर डालकर पैर साफ करने चाहे जो नहीं हुए । इतने कीचड के पैर इतने से पानी में कैसे साफ होंगे कहते हुए उसने सेवक से कहा- ला भैया थोडा पानी और दे । सेवक ने उसे और पानी दे दिया, उसे भी अपने पैरों पर डालकर भी वह अपने पैर पूरी तरह से साफ नहीं कर पाई ।

      तब तक देवरानी भी अपना घडा बाल्टी भरकर ला चुकी थी । उसके बर्तनों का पानी बगैर छलके पूरा भरा दिखाई दे रहा था । सेवक ने पैर साफ करने के लिये उसे भी एक लोटा पानी दिया जिसे उसने वहीं रखकर पहले जमीन से एक पत्ता उठाकर उस पत्ते से अपने पैर का अधिकांश कीचड साफ किया । फिर पानी की पतली सी धार एक पैर पर डालते हुए दूसरे पैर से रगडकर पहला पैर व फिर उसी प्रकार दूसरे पैर पर पतली सी धार डालते हुए दूसरे पैर से पहला पैर रगडकर साफ कर लिया व फिर दोनों पैरों को एक साथ साफ करने के बाद भी कुछ बचे हुए पानी के साथ लोटा वापस सेवक को लौटा दिया ।
       
       राजा व वजीर महल की खिडकी से दोनों महिलाओं के तरीके को बहुत ध्यान से देख रहे थे । राज दरबार में दोनों महिलाओं को उनके पतियों के साथ बुलवाकर राजा ने सभी दरबारियों के समक्ष बडे भाई को अपना फैसला सुना दिया कि तुम्हारी पत्नी लापरवाह और फिजूलखर्च है और बंटवारे के बाद अब यदि तुम्हें अपने हिस्से में कमी लग रही है तो उसकी जिम्मेदार तुम्हारी पत्नी के खर्च करने का तरीका है न कि बंटवारे में किसी प्रकार की बेईमानी ।
    
       और आसमान पर थूकने की सी कोशिश करती बडे भाई की शिकायती पत्नी अपने पति के साथ अपमानित होकर अपना सा मुंह ले घर वापस आ गई ।
   

गुरुवार, 31 मार्च 2011

ये पत्नियां !


         कल एक ब्लाग पर पत्नी की महिमा कुछ विशेष कम्प्यूटरीय विषेषणों से युक्त देखने के बाद पाठक वर्ग की जानकारी में कुछ और वृद्धि करने के उद्देश्य से-

 पत्नी
जो रहे पति से तनी-तनी,
खाली करवादे सारी मनी, 
कहलाती है वो पत्नी.


      एक पति ने पत्नी से पूछा : वाईफ का मतलब जानती हो- 'विदाउट इन्फर्मेशन फाईटिंग एवरीवेअर'.

      पत्नी - ये काम तो मैं जब चाहे कर सकती हूँ तभी तो  वाईफ को 'विद इटियट फार एवर' कहते हैं.

       एक पत्नी जो अपने पति की किसी बात पर उससे झगड रही थी, पति को न जाने क्या-क्या सुनाती जा रही थी और पति चुपचाप अपने अखबार में नजर गडाये सब सुन रहा था । पत्नी के सब्र की जब इन्तहा हो गई तो वो पति से गुस्से में बोल गई- कुछ जवाब क्यों नहीं देते ? जानवर कहीं के.
पति महोदय यहाँ भी चुप्पी ही साधे रहे.

        पति की चुप्पी के इस दौर में पत्नी आखिर अपने कमरे में चली गई । एकांत में पश्चाताप  भी हुआ कि मैंने क्रोध में अपने पति को जानवर कैसे बोल दिया । कुछ पश्चाताप की सी मुद्रा में वह अपने पति के पास आकर बोली मुझे माफ कर दो गुस्से में मैं आपको जानवर बोल गई । पति तब मुस्कराते हुए बोला- तो क्या हुआ वो तो मैं हूँ.
         पत्नी आश्चर्य से बोली ये कैसी बात कर रहे हैं आप ?
         तब पति अपनी पत्नी से बोला- देखो तुम मुझे जान कहती हो ना ? पत्नी ने स्वीकारा- हाँ.
        पति ने फिर कहा- और मैं तुम्हारा वर हूँ या नहीं
? पत्नी बोली- हाँ.
        तो फिर मैं जानवर हुआ या नहीं ? पति ने पत्नी की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा ।

         
         जानकारों की राय में- सयानी स्त्री पुरुष से जो कुछ भी कहती है उसमें थोडी शकर मिलाकर कहती है और पुरुष जो कुछ कहता है उसे थोडे नमक के साथ ग्रहण करती है ।


मंगलवार, 29 मार्च 2011

जीवन एक क्रिकेट !



जीवन एक क्रिकेट है
सृष्टि के महान स्टेडियम में,
धरती की विराट पिच पर
समय बालिंग कर रहा है,
शरीर बल्लेबाज है,
ईश्वर के इस आयोजन में
अम्पायर धर्मराज है.
 
बीमारियां फिल्डिंग कर रही हैं
विकेटकीपर यमराज है,
प्राण हमारा विकेट है
जीवन एक क्रिकेट है.
इस डे-नाईट के मेच में
रचनात्मकता के जलवे दिखाने हैं,
और सांसों के सीमित ओवर में
सृजन के रन बनाने हैं.
 
गिल्लियां उडने का अर्थ
सांस का टूट जाना है,
एल बी डबल्यू याने हार्ट-अटेक,
 दुर्घटना में मरने वाला
रन आऊट कहलाता है,
और सीमा पर शहीद होने वाला
कैच आऊट कहा जाता है.
 
आत्म हत्या का अर्थ
हिट विकेट
 और हत्या स्टम्प आउट हो जाना
है.
कुछ आक्रामक खिलाडी
जल्द ही पैवेलियन लौट जाते हैं
लेकिन पारी ऐसी खेलते हैं
कि कीर्तिमान स्थापित कर जाते हैं
 सबका अपना-अपना रन रेट है
जीवन एक क्रिकेट है ।
चिन्तन सौजन्य : 
राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी

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