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बुधवार, 13 अप्रैल 2011

जीवन चक्र !...



स्त्री काकरोच से डरती है
 
काकरोच चूहे से डरता है
 
चूहा बिल्ली से डरता है

बिल्ली कुत्ते से डरती है
 
कुत्ता आदमी से डरता है

आदमी स्त्री (पत्नी) से डरता है.


इसी वर्तुल में घूम रही इस गोल दुनिया में सभी अपनी जीवन यात्रा के दायरे में अनवरत घूम रहे हैं ।

चिन्तन सौजन्य-
राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागरजी महाराज

5 टिप्पणियाँ:

ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने कहा…

संतुलन के लिए यह ज़रूरी है !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

डर-चक्र।

Patali-The-Village ने कहा…

संतुलन के लिए यह ज़रूरी है| धन्यवाद|

mridula pradhan ने कहा…

mazedar......sachchayee.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बेहतरीन रचना ....बेहतरीन प्रस्तुति .....

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