सोमवार, 25 जुलाई 2016

मारवाडी फटाके...




            सेठाणीजी नाराज होकर बोली - "जो म्हारो ब्याव कोई असली राक्षस सु भी हो जातो ना; तो भी वो मन्ने थारैसुं जादा सुखी रांखतो ।"

            मारवाड़ी सेठजी - यो तो बिलकुल ही कोनी हो सकतो थो । 


            सेठाणीजी - क्यू कोनी हो सकतो थो ? 


            सेठजी - अये बावळी ! आपणा लोगां में एक ही गोत्र में ब्याव कोनी होवै. ।




            एक बार एक Punjabi कुए में गिर गया... ...और जोर जोर से रोने लगा  !

            एक मारवाड़ी वहाँ से जा रहा था उसने आवाज सुनी तो रुका और बोला :  "कुण है भाई ?"

            Punjabi : अस्सी हाँ !

            मारवाड़ी:  "भाई ! थे एक-दो होता,  तो काड देतो...

            80 तो म्हारै बाप से बी कोणी निकळै !"  पड्या रेओ !




मारवाडी सीख :
                              
           1.   चौखी संगत में उठणो बैठणो । 

            2.   काम स काम राखणो ।  
                  
            3.   ऊड़तो तीर नही पकडनो । 

            4.   घणो लालच कोनी करणो । 

            5. सोच समझकर पग राखणो ।

            6. रास्ते आणो, रास्ते जाणो ।   
 
            7. जितो हो सके उतो कम बोलणो ।

            8. छोटा-मोटा को कायदो राखणो।
 
            9.   जितो पचे उतो ई खाणो । (पेट खुदको होवे ।)
   
            10.  पूच्छ्या बीना सलाह नी देणो । 

            11.  पराई पंचायती नी करणी ।

            12.  आटा मे लूण समावे, लूण मे आटो कोनी ।

            13.  पगा बलती देखणी ढूंगा बलती कोणी । 

            14.  बीच में ही लाडे की भुवा नी बणनो ।

            15.  सुणनी सबकी करणी मन की ।



अठे हर कोई भरे बटका
घुमाबा नहीं ले जावां, तो घराळी भरे बटका।
घराळी रो मान ज्यादा राखां, तो माँ भरे बटका।
कोई काम कमाई नहीं करां, तो बाप भरे बटका।
पॉकेट मनी नहीं देवां, तो बेटा भरे बटका।
कोई खर्चो पाणी नहीं करां, तो दोस्त भरे बटका।
थोड़ो सो कोई न क्यूं कह दयां, तो पड़ौसी भरे बटका।
पंचायती में नहीं जावां, तो समाज भरे बटका।
जनम मरण में नहीं जावां, तो सगा संबंधी भरे बटका।
छोरा छोरी नहीं पढ़े, तो मास्टर भरे बटका।
पुरी फीस नहीं देवां, तो डॉक्टर भरे बटका।
गाड़ी का कागज पानड़ा नहीं मिले, तो पुलिस भरे बटका।
मांगी रिश्वत नहीं देवां, तो अफसर भरे बटका।
टाइम सूं उधार नहीं चुकावां, तो सेठ भरे बटका।
टेमूं टेम किश्त नहीं चुकावां, तो बैंक मैनेजर भरे बटका।
नौकरी बराबर नहीं करां, तो बॉस भरे बटका।
फेसबुक पर लाइक कमेंट नहीं करां, तो फ्रेंड भरे बटका।
अब थे ही बताओ, जावां तो कठे जावां,
अठे हर कोई भरे बटका, अठे हर कोई भरे बटका।
 


रविवार, 17 जुलाई 2016

ईश्वर आज अवकाश पर हैं...


ईश्वर आज अवकाश पर हैं, मंदिर की घंटी ना बजाइये ।

जो बैठे हैं बूढ़े - बुज़ुर्ग,  अकेले पार्क में ...
जाकर  उनके साथ कुछ समय बिताइये ।
ईश्वर आज अवकाश पर है, मंदिर की घंटी ना बजाइये ।

ईश्वर है पीड़ित परिवार के साथ, जो अस्पताल में आज परेशान है ...
उस पीड़ित परिवार की जाकर कुछ मदद कर आइये ।
ईश्वर आज अवकाश पर हैं, मंदिर की घंटी ना बजाइये।

एक चौराहे पर खड़ा युवक, काम की तलाश में है,
उसके पास जाकर, उसे नौकरी के अवसर दिलाइये ...
ईश्वर आज अवकाश पर हैं, मंदिर की घंटी ना बजाइये ...

ईश्वर है चाय कि दुकान पर, उस अनाथ बच्चे के साथ ...
जो, कप प्लेट धो रहा है,
पाल सकते हैं, पढ़ा सकते हैं, तो उसको आप पढ़ाइये ...
ईश्वर आज अवकाश पर हैं, मंदिर की घंटी ना बजाइये ।

एक बूढ़ी औरत, जो दर दर भटक रही है,
एक अच्छा सा लिबास जाकर उसे दिलाइये ...
हो सके तो, उसे किसी नारी आश्रम में छोड़ आइये ।
ईश्वर आज अवकाश पर हैं, मंदिर की घंटी ना बजाइये ।


सोमवार, 11 जुलाई 2016

कर्मफल


            भीष्म पितामह रणभूमि में शरशैया पर पड़े थे । हल्का सा भी हिलते तो शरीर में घुसे हुए बाण भारी वेदना के साथ रक्त की पिचकारी सी छोड़ देते। ऐसी दशा में उनसे मिलने सभी आ जा रहे थे। श्री कृष्ण भी दर्शनार्थ आये। उनको देखकर भीष्म जोर से हँसे और कहा... आइयें जगन्नाथ ! आप तो सर्व ज्ञाता हैं । सभी कुछ जानते हैं, बताइए मैंने ऐसा कौनसा पाप किया था जिसका दंड इतना भयावह मिला...?

            कृष्ण : पितामह ! आपके पास वह शक्ति है, जिससे आप अपने पूर्व जन्म देख सकते हैं, आप स्वयं ही देख लेते ।

             भीष्म : देवकी नंदन ! मैं यहाँ अकेला पड़ा और कर ही क्या रहा हूँ..? मैंने सब देख लिया ...अभी तक 100 जन्म देख चुका हूँ ।  मैंने उन 100 जन्मों में एक भी कर्म ऐसा नहीं किया जिसका परिणाम ये हो कि मेरा पूरा शरीर बिंधा पड़ा है,  हर आने वाला क्षण... ओर पीड़ा लेकर आता है ।
 
            कृष्ण : पितामह ! आप एक भव और पीछे जाएँ, आपको उत्तर मिल जायेगा ।

             भीष्म ने ध्यान लगाया और देखा कि 101 भव पूर्व वो एक नगर के राजा थे ।  एक मार्ग से अपनी सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ कहीं जा रहे थे । एक सैनिक दौड़ता हुआ आया और बोला - राजन ! मार्ग में एक सर्प पड़ा है, यदि हमारी टुकड़ी उसके ऊपर से गुजरी तो वह मर जायेगा ।

             भीष्म ने कहा... एक काम करो... उसे किसी लकड़ी में लपेट कर झाड़ियों में फेंक दो ।
 
             सैनिक ने वैसा ही किया... उस सांप को एक लकड़ी में लपेटकर झाड़ियों में फेंक दिया । दुर्भाग्य से झाडी कंटीली थी, सांप उनमें फंस गया, जितना प्रयास उनसे निकलने का करता और अधिक फंस जाता । कांटे उसकी देह में गड गए, खून रिसने लगा। धीरे धीरे वह मृत्यु के मुंह में जाने लगा । 5-6 दिन की तड़प के बाद ही उसके प्राण निकल पाए ।
 
             भीष्म : हे त्रिलोकी नाथ ! आप जानते हैं कि मैंने जानबूझ कर ऐसा नहीं किया,  अपितु मेरा उद्देश्य उस सर्प की रक्षा का था, तब ये परिणाम क्यों...?
  
            कृष्ण: तात श्री ! हम जान बूझ कर क्रिया करें या अनजाने में ...किन्तु क्रिया तो हुई न... उसके प्राण तो गए ना... ये तो विधि का विधान है कि जो क्रिया हम करते हैं उसका फल  हमें भोगना ही पड़ता है... आपका पुण्य इतना प्रबल था कि 101 भव उस पाप फल को उदित होने में लग गए ।  किन्तु  अंततः वह  हुआ ।
            किसी भी जीव को लोग जान बूझ कर मार रहे हैं... उसने जितनी पीड़ा सहन की.. वह उस जीव (आत्मा) को इसी जन्मअथवा अन्य किसी जन्म में अवश्य भोगनी होगी ।


            अतः अपनी हर दैनिक क्रिया सावधानीपूर्वक ही करें । क्योंकि कर्मों का फल देर-सवेर  भुगतना तो अवश्यमेव  पडता ही है ।

         

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

इस गुप्त नवरात्री में कीजिये देवी को प्रसन्न


            हिन्दू धर्म में नवरात्र मां दुर्गा की साधना के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्र के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते हैं। तंत्र साधना आदि के लिए गुप्त नवरात्र बेहद विशेष माने जाते हैं। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। इस नवरात्रि के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है।

            शिवपुराण के अनुसार पूर्वकाल में राक्षस दुर्ग ने ब्रह्मा को तप से प्रसन्न कर चारों वेद प्राप्त कर लिए। तब वह उपद्रव करने लगा। वेदों के नष्ट हो जाने से देव-ब्राह्मण पथ भ्रष्ट हो गए, जिससे पृथ्वी पर वर्षों तक अनावृष्टि रही।पृथ्वी पर रूद्र, वरुण, यम आदि का प्रकोप बढ़ने लगता है। इन विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना की जाती है ।

            सतयुग में चैत्र नवरात्र, त्रेता में आषाढ़ नवरात्र, द्वापर में माघ, कलयुग में आश्विन की साधना-उपासना का विशेष महत्व रहता है। मार्कंडेय पुराण में इन चारों नवरात्रों में शक्ति के साथ-साथ इष्ट की आराधना का भी विशेष महत्व है । 

            देवताओं ने मां पराम्बा की शरण में जाकर दुर्ग का वध करने का निवेदन किया। मां ने अपने शरीर से काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमावती, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी नाम वाली दस महाविद्याओं को प्रकट कर दुर्ग का वध किया। दस महाविद्याओं की साधना के लिए तभी से गुप्त नवरात्र मनाया जाने लगा।

            गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि (माघ तथा आषाढ़) में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं ।

            "ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।

        दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते “सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित: ।

            मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: ॥”

           इस नवरात्र में देवी साधक और भक्त--- 'ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे नम:' मंत्र जाप करें।

             मां काली के उपासक---- 'ऊं ऐं महाकालाये नम:' मंत्र का जाप करें।

            व्यापारी लोग----'ऊं हीं महालक्ष्मये नम:' मंत्र का जाप करें।

            विद्यार्थी---- 'ऊं क्लीं महासरस्वतये नम:' मंत्र जपें।
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गुप्त नवरात्र 2016

            आषाढ़ नवरात्र गुप्त नवरात्रों के नाम से भी जाने जाते हैं. आषाढ़ महीने यानी जून और जुलाई  माह में पड़ने के कारण इन नवरात्रों को आषाढ़ नवरात्र कहा जाता है, हालाँकि देश के अधिकतर भाग में गुप्त नवरात्रों के बारे में लोग नहीं जानते हैं. उत्तरी भारत जैसे हिमाचल प्रदेश, पंजाब , हरयाणा, उत्तराखंड के आस पास के प्रदेशों में गुप्त नवरात्रों  में माँ भगवती की पूजा की जाती है. माँ भगवती  के सभी 9 रूपों की पूजा नवरात्रों के भिन्न – भिन्न दिन की जाती है , अतः आइये देखते हैं  इन दिनों में किस देवी की पूजा  कब की जानी चाहिए---

            5 जुलाई (मंगलवार) 2016 : घट स्थापन एवं माँ शैलपुत्री पूजा

            6 जुलाई (बुधवार) 2016 : माँ ब्रह्मचारिणी पूजा

            7 जुलाई (बृहस्पतिवार) 2016 : माँ चंद्रघंटा पूजा

            8 जुलाई (शुक्रवार) 2016: माँ कुष्मांडा पूजा

            9 जुलाई (शनिवार) 2016: माँ स्कंदमाता पूजा

            10 जुलाई (रविवार)  2016: : माँ कात्यायनी पूजा

            11 जुलाई (सोमवार)  2016:  माँ कालरात्रि पूजा

            12 जुलाई(मंगलवार) 2016 : माँ महागौरी पूजा, दुर्गा अष्टमी

            13 जुलाई (बुधवार) 2016 : माँ सिद्धिदात्री

            14 जुलाई (बृहस्पतिवार)  2016: नवरात्री पारण
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गुप्त नवरात्र पूजा विधि---

            मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

गुप्त नवरात्री में सिद्धि के लिए गुप्त स्थान या सिद्ध श्मशान-
            यह साधनाएं बहुत ही गुप्त स्थान पर या किसी सिद्ध श्मशान में की जाती है । दुनियां में सिर्फ चार श्मशान घाट ही ऐसे हैं जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है। ये हैं तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) का श्मशान, त्रयंबकेश्वर (नासिक) और उज्जैन स्थित विक्रांत भैरव या चक्रतीर्थ श्मशान ।

            गुप्त नवरात्रि में यहां दूर-दूर से साधक गुप्त साधनाएं करने आते हैं। नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृद्धि करने के लिए अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं।
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गुप्त नवरात्रि का महत्त्व ---

            देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है । कहा जाता है कि मां के नौ रूपों की भक्ति करने से हर मनोकामना पूरी होती है। नौ शक्तियों के मिलन को ही नवरात्रि कहते हैं। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में 4 माह नवरात्रि के लिए निश्चित हैं।

            मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधनाकाल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ‘दुर्गावरिवस्या’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। ‘शिवसंहिता’ के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति मां पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं। गुप्त नवरात्रों के साधनाकाल में मां शक्ति का जप, तप, ध्यान करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं नष्ट होने लगती हैं।

            गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।गुप्त नवरात्र में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्रों में साधना की थी। शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुलदेवी निकुम्बाला की साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है ||

            गुप्त व चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर होता है। धार्मिक दृष्टि से हम सभी जानते हैं कि नवरात्र देवी स्मरण से शक्ति साधना की शुभ घड़ी है। दरअसल, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु। जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है।  नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं। जिससे इंसान निरोगी होकर लंबी आयु और सुख प्राप्त करता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार गुप्त नवरात्र में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है। देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप है। दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है। यह दमन या अंत होता है शत्रु रूपी दुर्गुण, दुर्जनता, दोष, रोग या विकारों का। ये सभी जीवन में अड़चनें पैदा कर सुख-चैन छीन लेते हैं। यही कारण है कि देवी दुर्गा के कुछ खास और शक्तिशाली मंत्रों का देवी उपासना के विशेष काल में जाप शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी भय बाधा का नाश करने वाला माना गया है।  सभी’नवरात्र’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक किए जाने वाले पूजन, जाप और उपवास का प्रतीक है- ‘नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते’। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं। नवरात्र के नौ दिनों तक समूचा परिवेश श्रद्धा व भक्ति, संगीत के रंग से सराबोर हो उठता है। धार्मिक आस्था के साथ नवरात्र भक्तों को एकता, सौहार्द, भाईचारे के सूत्र में बांधकर उनमें सद्भावना पैदा करता है।

गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां---

            गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं ।


शनिवार, 2 जुलाई 2016

विचित्र विशेष :

            गुजरात के सूरत शहर मे एक रेस्टोरेंट ने 1500/- की थाली लांच की है । इसका नाम है बकासूर थाली...



            और इस बकासूर थाली मे 100 प्रकार के आइटम हैं, जिनमे 55 प्रकार की शाकाहारी सब्जियां और 21 प्रकार की मिठाइयां शामिल है ।

            अब सरप्राइज ये है कि अगर कोई व्यक्ति इस बकासूर थाली के पूरे आइटम खा लेगा तो उसे रेंस्टोरेट की तरफ से 1 लाख रु. इनाम भी दिया जायेगा ।

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हिमालय  में खिला "नागपुष्प"

 

            बरसो बाद दिखाई दिया.... ये पुष्प शेषनाग की तरह दीखता है जो करीब 36 सालो में एक बार ही देखा जा सकता है ।
 
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केरल के कॉलेज मे जीन्स बैन करने के बाद... 


लडकियां लूँगी पहन कर आ गई, अब प्रशाशन पशोपेश में.

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            एक दिन दादी घर पर बैठीं थीं । तभी फोन की घण्टी बजी । फोन से बात करके दादी बहुत खुश हुईं क्योंकि पोते एवं पोती दादी से मिलने आ रहे थे । 
            दादी खुशी में झूम उठीं और बोली-  'हां, तुम लोग आ रहे हो तो ढेर सारी बातें करेंगे । और हां, मैं नाती को भी फोन करके बुला लेती हूँ। सब मिलकर खूब बातें करेंगे,  मजे करेंगे ।
            फिर सब लोग दादी से मिलने सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर पहुंचे । आगे क्या होता है ? इसके लिए नीचे का फोटो देखिये-
  

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और ये हैं पर्यावरण पुरस्कार के...



असली हकदार...!
 

पुकार...


            एक कंस्ट्रक्शन साईड पर चलते काम में 6ठे माले पर मौजूद इंजीनियर ने सडक पर काम कर रहे एक कर्मचारी को आवाज दी जो काम के शोर के कारण नीचे मौजूद उस कर्मी ने नहीं सुनी । इंजीनियर ने उसे फिर आवाज दी, उसने फिर भी नहीं सुनी । इंजीनियर ने उसका ध्यान आकर्षित करवाने हेतु 10/- रु. का सिक्का नीचे उस कर्मचारी के पास फेंका जो ठीक उसके बगल में जाकर गिरा । नीचे मौजूद कर्मचारी ने उपर देखें बगैर वो सिक्का उठाकर अपनी जेब में डाल लिया और फिर अपने काम में लग गया । इस बार उपर मौजूद उस इंजिनीयर ने 500/- रु. का नोट उसके उपर छोटी सी घडी बनाकर फेंका, वह नोट भी उस कर्मचारी के बगल में जाकर ही गिरा । नीचे मौजूद उस कर्मचारी ने फिर उपर देखें बगैर वो नोट उठाकर अपनी जेब में डाला और फिर अपने काम में लग गया ।  अंततः उपर मौजूद इंजीनियर ने एक छोटा पत्थर उठाकर उस कर्मचारी पर फेंका जो उसके सर में जाकर लगा और तब उस नीचे मौजूद कर्मचारी की निगाहें उपर की ओर उठी । 

            वास्तविक जिंदगी में उपर मौजूद वह इंजीनियर ईश्वर है और नीचे मौजूद कर्मचारी हम स्वयं हैं । हम भी ईश्वर से प्राप्त समस्त नेमतें अपना अधिकार मानते हुए ग्रहण करते चले जाते हैं, किंतु ईश्वर को याद अथवा उनका शुक्रिया अदा नहीं करते । फिर जब वो हमें तकलीफरुपी पत्थर मारकर हमें जगाता है तब हम तत्काल उसकी ओर देखते हुए उनसे समस्या मुक्ति का मार्ग उपलब्ध करवाने हेतु मन्नत, निवेदन व नाना प्रकार के उपाय करने लगते हैं ।

             क्या यह उचित नहीं माना जाना चाहिये कि जब-जब भी किसी भी प्रकार की छोटी या बडी नेमतें प्राप्त हों चाहें वो हमें अपने काम का वास्तविक प्रतिसाद ही क्यों न लगता रहा हो, हम कुछ समय रुककर अपने उस ईश्वर का शुक्रिया अदा करें और फिर दुगने-जोशो-खरोश से अगली उपलब्धियों के लिये प्रयासरत हो जावें । सयाने और समझदार लोग तो सुबह उठते ही सबसे पहले ईश्वर को इसी लिये इस बात पर भी धन्यवाद देते हैं कि अपने जीवनकाल में ईश्वरकृपा से उन्हें एक और नया सूर्योदय देखने को मिल रहा है ।


            संकट में याद करने वालों से तो देश व दुनिया के अधिकांश मंदिर बीसीयों घंटे भीड से खचाखच भरे दिखते ही रहते हैं किंतु संकटकाल के बगैर भी यदि ईश्वर को याद करते रहने और उनका धन्यवाद अर्पित करते रहने का सिलसिला निर्बाध क्रम से हम जारी रख सकें तो हो सकता है कि विपत्तियों के बडे चक्र में फंसने की स्थिति ही कभी ना बनने पावे ।

            शायद इसी बात को संत कबीरदासजी ने यूं परिभाषित किया है-

दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करें तो दुःख काहे को होय ।
 

इलाज...!

        एक महिला ने अपने पति का मोबाइल चेक किया तो फोन  नंबर कुछ अलग ही तरीके से  Save किये हुए दिखे, जैसे :-         आँखों का इलाज ...