रविवार, 23 फ़रवरी 2020

भगवान भोलेनाथ का साम्राज्य...




      वैसे तो समूचि सृष्टि पर ही भगवान का साम्राज्य रहता है किंतु इस बार महाशिवरात्रि पर विख्यात ज्योतिर्लिंगों के संदर्भ में ऐसी रोचक जानकारी सामने आई है जिसे में आपके साथ भी साझा कर रहा हूँ ।

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       भारत में ऐसे शिवमंदिर हैं जो केदारनाथ से लगाकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये हैं । केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 कि.मी. की दूरी है । लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं । हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया यह आज तक रहस्य ही है ।

     उत्तराखंड में केदारनाथ,  तेलंगाना में कालेश्वरम,  आंध्रप्रदेश में कालहस्ती, तमिलनाडू में एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को उपर के चित्रानुसार 79° E 41’54” Longitude  की भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है । यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में शिवलिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे हम सामान्य भाषा में पंचभूत यानी जल, थल, नभ, वायु और अग्नि कहते हैं । इन्हीं पंचतत्वों के आधार पर इन पांचों शिवलिंगों की प्रतिस्थापना की गई है । इनमें-

जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल में
      तिरूवनिक्का मंदिर के अंदर जलवसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है ।

थल (पृथ्वी) का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम में
      कांचीपुरम के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है ।

नभ या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में
      चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान के निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है ।

वायु का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में
     श्री कालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है ।

अग्नि का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में
     अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है ।

इस प्रकार ये पांचों मंदिर वास्तु-विज्ञान-वेद के अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ।

       भौगॊलिक रूप से इन मंदिरों का करीब चार हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांश को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक भी उपलब्ध नहीं थी, तब कैसे इतने सटीक रूप से इन पांचों मंदिरों को प्रतिस्थापित किया गया होगा इसका उत्तर भगवान ही जानें । 

      ब्रह्मांड के पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व करनेवाले इन पांच शिवलिंगो को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिस्थापित किया जा चुका था, इस हेतु हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसा विज्ञान और तकनीक थे जिसे आधुनिक विज्ञान भी समझ नहीं पाया है । 

     यह माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होगें जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं । इस रेखा को शिवशक्ति अक्श रेखा  भी कहा जाता है । संभवता यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हैं जो 81.3119° E  में पड़ता है ।

     इन सभी ज्योतिर्लिंग का उज्जैन महांकाल से कितना महत्वपूर्ण सम्बन्ध है इसे आप उज्जैन से इनकी दूरी के साथ देखिये-

उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 कि.मी.

उज्जैन सेल्लिकार्जुन- 999 कि.मी.

उज्जैन से केदारनाथ- 888 कि.मी.
उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 कि.मी.
उज्जैन से सोमनाथ- 777 कि.मी.
उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 कि.मी.
उज्जैन से भीमाशंकर- 666 कि.मी.
उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 कि.मी.
उज्जैन से बैजनाथ- 999 कि.मी.
उज्जैन से रामेश्वरम- 1999 कि.मी.
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      सामान्य जानकारी के मुताबिक वैसे भी उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है । इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिषिय गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी करीब 2050 वर्ष पहले बनाये गये हैं । करीब 100 साल पहले जब पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला । आज भी सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं ।
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उज्जैन महांकाल की सुप्रसिद्ध प्रातःकालीन भस्मारती...



बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

सावधानी हटी कि आपके साथ दुर्घटना घटी.

सावधानी हटी कि आपके साथ दुर्घटना घटी.
सावधान रहें - सुरक्षित रहें.

        जनसामान्य को ठगने व लूटने के जो नये-नये तरीके अपराधियों द्वारा ईजाद किये जा रहे हैं । उनमें जहाँ भी आपकी सावधानी हटी कि आपके साथ दुर्घटना घटी. और तब आपके जान व माल दोनों की सुरक्षा खतरे में पड सकती है । यहाँ हम आपको क्राईम ब्रांच के पोलिस कमिश्नर द्वारा दी गई सुरक्षा जानकारी से अवगत करवा रहे हैं जिसके अनुसार-


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        यदि आप कहीं बस या ट्रेन के सफ़र में जा रहे हों तो सहयात्री के रुप में आपसे परिचय बढाकर आपको जहरमिश्रित खाने-पीने की वस्तु देकर आपको लूटा जा सकता है जिससे आपको बचना आवश्यक है, इसके अलावा भी इस दौरान यदि आपके पास कोई भिखारी आकर खाना मांगे तो आप भूलकर भी उसे खाना देने की गल्ति ना करें वरना ये दरियादिली आपके लिए मुसीबत बन सकती है ।

        आजकल ऐसे ट्रैंड भिखारियों के गैंग चल रहे हैं जो आपसे खाना मांगते हैं और ज्यों ही उनका कोई सदस्य उस में से कुछ खाता है वो मुंह से झाग निकालते हुए तड़पने का नाटक करने लग जाता है फिर उस गिरोह के अन्य सदस्य आपसे मारपीट पर उतारु हो जाते हैं और पुलिस केस में फ़ंसाने की धमकियां देते हैं । इसमें इनकी सेटिंग वहां के पुलिस वालों से भी होती है और वे आप से जबरन एक मोटी रकम वसूल कर सकते हैं । इसलिये अच्छा होगा कि आप बचा हुआ खाना किसी कुत्ते को डाल दें लेकिन भूलकर भी ऐसे भिखारियों को न दें ।

        दूसरे यदि आप रात में गाड़ी चला रहे हैं और कोई आपके WINDSCREEN पर अंडा फेंक दे तो कार की जांच के लिए गाडी रोकें नहीं और ना ही गाडी के  वाइपर संचालित करते हुए किसी भी तरह का पानी विंडस्क्रीन पे ना डालें,  क्योंकि अंडे के साथ मिश्रित पानी दूधिया बन जाता है जो आपकी दृष्टि को 92.5% तक के लिए ब्लॉक कर देता है । फिर आपको मजबूरन गाडी को सड़क के किनारे लगाकर रोकना पड़ता है जहाँ आप पहले से घात लगाकर बैठे अपराधियों के चंगुल में फँस जाते हैं । यह इनकी ऐसी तकनीक है जिसका प्रयोग आजकल हाईवे पर अपराधिक गिरोहो द्वारा बहुतायद में किया जा रहा है । अतः कृपया अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी सतर्कता से संबंधित यह जानकारी अवश्य शेअर करें ।

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लूटपाट का एक और दिलचस्प तरीका इस वीडिओ में भी अवश्य देखें-


                

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

लक्ष्य पर ध्यान जीवन में कितना जरुरी है ?

लक्ष्य पर ध्यान दें
लक्ष्य पर ध्यान रखें

लक्ष्य पर ध्यान 

      बात चाहे अपने आस-पास की हो या दूरदराज के किसी क्षेत्र अथवा देश विदेश की, लेकिन जीवन में किसी उल्लेखनीय व्यक्ति की मुख्य उपलब्धियों तक पहुंचने की यात्रा को यदि ध्यान से देखा-समझा जावे तो यह बात अवश्य सामने आएगी कि उन्होंने कुछ भी हासिल करने के लिये पहले अपना गोल सेट किया, अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया और फिर अपनी सारी ताकत अपने उस लक्ष्य को पूर्ण करने के प्रयास में लगा दी और तब वे निर्विवाद रुप से अपने लक्ष्य तक बिना किसी बाधा के पहुंच पाए ।

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      यह कतई जरुरी नहीं कि कोई शख्स किसी बडे अथवा बहुत बडे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये प्रयासरत हो तभी यह नियम उपयोगी होता हो, बल्कि छोटे-छोटे लक्ष्य भी तब तक हासिल नहीं किये जा सकते जब तक हमारा अपने लक्ष्य पर ध्यान तब तक न बना रहे जब तक कि हम उसे हासिल न कर लें । अपने इस प्रयास में सामने आने वाली आपकी आलोचना भी आपके रास्ते में बाधक नहीं बनना चाहिए ।

लक्ष्य पर ध्यान से उपलब्धि.
लक्ष्य पर ध्यान से एकाग्रता वृद्धि.

लक्ष्य पर ध्यान से प्राप्त उपलब्धि-

      स्वामी विवेकानंद के जीवन की बेशुमार उपलब्धियों से शायद ही कोई अनभिज्ञ रहा हो आईये उनका जीवन-दर्शन इस उदाहरण से समझने का प्रयास करें- एक बार स्वामी विवेकानंद रेल से कही जा रहे थे । जिस कोच में वे यात्रा कर रहे थे, उसी कोच में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे । उन अंग्रेजों को साधुओं से बहुत चिढ़ थी और वे अपने साथ भगवा वेशधारी यात्री को देख साधुओं की लगातार निंदा कर रहे थे और साथ वाले साधु यात्री याने स्वामी विवेकानंद को भी वे गालियां दे रहे थे । वे समझ रहे थे कि ये साधु तो अंग्रेजी नहीं जानतेइसलिए उन अंग्रेजों की बातों को नहीं समझ पावेंगे और इसी आधार पर उन अंग्रेजों ने आपसी बातचीत में साधुओं को कई बार भला-बुरा कहा । हालांकि उन दिनों हकीकत यह थी भी कि अंग्रेजी जानने वाले साधु प्रायः होते भी नहीं थे ।

      रास्ते में एक बड़ा स्टेशन आया । उस स्टेशन पर विवेकानंद के स्वागत में हजारों लोग उपस्थित थे,  जिनमे बडे-बडे विद्वान् एवं अधिकारी भी मौजूद थे । वहाँ उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने के बाद अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर स्वामीजी अंग्रेजी में ही दे रहे थे । उन्हें इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते देख उन अंग्रेज यात्रियों को सांप सूंघ गया, जो रेल में उनकी बुराई कर रहे थे । अवसर मिलने पर वे विवेकानंद के पास आये और उनसे नम्रतापूर्वक पूछा- आपने हम लोगों की बातें सुनी । Sorry, आपको बहुत बुरा लगा होगा ?

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     तब स्वामीजी ने सहज शालीनता से कहा-  “मेरा मस्तिष्क अपने ही कार्यों में इतना व्यस्त था कि आप लोगों की बात सुनी तो भी उन पर ध्यान देने और उनका बुरा मानने का मुझे अवसर ही नहीं मिला । स्वामीजी की जवाब सुनकर उन अंग्रेजो का न सिर्फ शर्म से सिर झुक गया बल्कि उन्होंने भी स्वामीजी के चरणों में झुककर उनकी शिष्यता स्वीकार कर ली ।

      इसलिये यदि जीवन में कुछ भी करने या पाने की चाह हमारे अंदर मौजूद हो तो हमें सदैव अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए ।

कला के क्षेत्र में लक्ष्य पर ध्यान की उपयोगिता-


      लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर चलने वाले इन कलाकारों को भी आप नीचे के इस वीडिओ में अवश्य देखिये जिन्होंने पशु-पक्षी व सडकों पर चलते वाहनों को सिर्फ अपनी आवाज के द्वारा कितने जीवंत अंदाज में यहाँ प्रस्तुत कर दिखाया है-


शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

मंदिर में देवदर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर क्यों बैठते हैं ?


         हिंदू धर्म में यह परम्परा है कि किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आकर मंदिर की पेढी या ओटले पर दो मिनिट तो बैठना ही चाहिये । क्या आप जानते हैं कि इस परम्परा के पीछे कारण क्या है ?

             वैसे तो आजकल लोग मंदिर के ओटले पर बैठकर अपने घर, व्यापार, राजनीति व ऐसे ही अन्य विषयों की चर्चा करते दिखते हैंकिंतु यह प्राचीन परम्परा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है । वास्तव में मंदिर के ओटले पर बैठ कर इस एक श्लोक को हर किसी को ही बोलना चाहिए । जिसे आजकल के लोग भूल गए हैं । इस श्लोक का मनन करें और इसे आने वाली पीढ़ी को भी बताएं । यह श्लोक इस प्रकार है-


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अनायासेन मरणम्,
बिना देन्येन जीवनम् ।
देहान्त तव सानिध्यम्
देहि मे परमेश्वरम् ॥

इस श्लोक का अर्थ है-

        अनायासेन मरणम् अर्थात् बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर न पड़ें कष्ट उठाते हुए हमारी मृत्यु ना हो और चलते-फिरते ही हमारे प्राण निकलें ।


        बिना देन्येन जीवनम् : अर्थात् परवशता का जीवन ना हो । कभी किसी के सहारे ना रहाना पड़े । जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हों । ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सकें ।


        देहांते तव सानिध्यम : अर्थात् जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर श्रीकृष्ण जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए थे ऐसे ही उनके दर्शन करते हुए हमारे प्राण निकलें ।


        देहि में परमेशवरम् : हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें दें ।


       अपने ईश्वर से प्रार्थना करते हुऐ उपरोक्त श्र्लोक का पाठ करें । घर, गाड़ीलड़कालड़की पति पत्नी धन, वैभव ऐसी सांसरिक वस्तुएं वहां नहीं मांगना हैक्योंकि यह सब तो आप की पात्रता के हिसाब से भगवान आपको दे ही देते हैं । इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए । ध्यान दें कि यह प्रार्थना हैयाचना नहीं है, क्योंकि याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है जो भीख सदृष मानी गई है । जबकि प्रार्थना शब्द में 'प्र' का अर्थ होता है विशेषअर्थात् विशिष्ट श्रेष्ठ और 'अर्थना' याने निवेदन । इस प्रकार प्रार्थना का मतलब विशेष निवेदन होता है ।


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            मंदिर में भगवान का दर्शन सदैव खुली आंखों से करना चाहिए, उनकी छबि निहारना चाहिए । कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं । वहाँ आंखें क्यों बंद करना हम तो वहाँ दर्शन करने आए हैं भगवान के स्वरूप का उनके श्री चरणों कामुखारविंद का श्रृंगार का अतः देवदर्शऩ में संपूर्ण आनंद लें प्रभु के निज-स्वरूप को अपनी आंखों में भर ले ।


        दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें  तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किये हैं उस स्वरूप का ध्यान करें । मंदिर से बाहर आने के बादपेढी पर बैठ कर स्वयं की आत्मा का ध्यान करें तभी अपने नेत्र बंद करें ।
  विद्वजनों से प्राप्त...  

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

ताजमहल और रामसेतु.




प्रेम की सर्वश्रेष्ठ निशानी

        क्लास में जब टीचर ने पूछा कि  दुनिया में प्रेम की निशानी किस जगह को कहा जाता है ?  तब पूरी क्लास एक आवाज़ में बोली- "ताजमहल" !

        लेकिन उन्हीं में से एक छात्र ने जवाब दिया- "रामसेतु" !

        टीचर ने उसे खड़ा किया और  पूछा-  बताओ कैसे ?

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        तब उस  छात्र ने कहा-  "रामसेतु का निर्माण प्रभु श्रीराम ने अपने पत्नी सीता को आततायी रावण के चंगुल से मुक्त करवाकर वापिस लाने के लिए समुद्र पर करवाया ।  किसी दूसरे की जमीन को हथिया कर नहीं और इस रामसेतु का निर्माण करने वाले अपने सभी साथियों को प्रभु श्रीराम ने पूरा सम्मान दिया,  ना कि उनके हाथ काटे । जबकि ताजमहल को बनाने वाले कारीगरों का परिणाम हम सब जानते हैं ।

        टीचर और छात्र सभी स्तब्ध हो गए ।

        वास्तव में हमे भी हमारे इतिहास और पौराणिक कथाओं को नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है ।

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 दुनिया के विचित्र व मशहूर ब्रिज ( सेतु )


गुरुवार, 23 जनवरी 2020

माधुर्य का माध्यम...


      अपने इर्द-गिर्द हम जब-तब संगीत की सुमधुर धुनों को प्रायः अलग-अलग स्थान व अलग-अलग अवसरों पर सुनते रहते हैं और धुनों के इस सैलाब में इंसान को बहा ले जाने की ताकत भी यदि कहीं तलाशी जावे तो वह हिंदी फिल्मों के उन मशहूर गीतों में बहुत ही आसानी से देखी जा सकती है जहाँ हम जीवन की किसी भी मनोदशा से सम्बन्धित मधुरतम गीतों का अपने मूड और अवसर के मुताबिक आसानी से चुनाव कर सकते हैं ।

      चिकित्सा जगत में भी अब इन कर्णप्रिय गीतों के श्रवण द्वारा रोगियों के शीघ्र रिकवरी कर सकने की इस माध्यम की क्षमता को मान्यता मिल चुकी है । किसी डिप्रेशन (अवसाद) से ग्रस्त व्यक्ति के उपचार में भी दवाई के समानान्तर इन गीतों की मदद जब ली जाती है तो रुग्ण व्यक्ति को अधिक तेजी से सामान्य जीवन में लौटने में मदद मिलती है । कई हॉस्पीटल्स में रोगियों से भरे-पूरे वार्ड में धीमी गति से इन मधुर गीतों की धुनों का प्रसारण रोगियों की बेहतर रिकवरी के लिये प्रारम्भ हो चुका है ।

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      निःसंदेह फिल्मों की इस महत्वपूर्ण देन के लिये हम भारतीय फिल्मों को इसका पूरा श्रेय दे सकते हैं क्योंकि विदेशों में बनने वाली दूसरी सबसे प्रचलित भाषा अंग्रेजी की फिल्मों में प्रायः ऐसे गीतों की जीवंत मौजूदगी देखने में नहीं आती जबकि भारत में इस विधा को पोषित-पल्लवित करने के लिये एक से बढकर एक गीतकार, संगीतकार व गायक-गायिकाओं ने अपना पूरा जीवन व योग्यता इसके माधुर्य को आगे बढाने के लिये समर्पित की है ।

      हिंदी फिल्म संगीत की मधुरता के आकर्षण से विदेशों में मौजूद अलग-अलग भाषाओं वाले देशों के नागरिक भी अछूते नहीं रहे हैं । उनके अपने सामूहिक आयोजनों में भारतीय फिल्मों के यही लोकप्रिय गीत उनकी अपनी शैली में उन्हीं के द्वारा गाते-बजाते देखने में आते रहते हैं । हमारी सरहदों की सुरक्षा के लिये अपनी जान हथेली पर रखकर ड्यूटी निभाने वाले हमारे वीर सैनिकों के लिये भी मधुर संगीत का यही माध्यम उनके मनोरंजन का सर्वाधिक पसंदीदा माध्यम  साबित होता है ।

      देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण व संजीदा पद पर आसीन हमारे नौसेनाध्यक्ष द्वारा सार्वजनिक मंच से प्रस्तुत किये गये कार्यक्रम का एक वीडिओ क्लिप भी आप अवश्य देखें, जिसमें वे इस मधुर गीत का अपने ही अन्दाज में आनंद लेते दिखाई दे रहे हैं ।

     

      इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील पद के तनाव से संगीत के ये पल इन्हें न सिर्फ सुकून देने वाले होते हैं बल्कि आनंद व मस्ती के मूड में आप अरब देशों के इन नागरिकों को भी भारतीय फिल्मी गीतों की तान पर मस्ती में झूमते गाते अब नीचे के इस वीडिओ में भी देखें...
      
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      तो अब जब भी कभी आप अच्छा महसूस करने में कोई कमी महसूस करें या किसी प्रकार का तनाव महसूस करें तो सुमधुर संगीत के इस माध्यम का अपने मोबाईल, लेपटॉप या पेऩड्राईव द्वारा अपने पसंदीदा फिल्मी गीत-संगीत का आनंद लेने की कोशिश करें । निश्चित रुप से कुछ ही देर में आप अपने नैराश्य के उस मूड से स्वयं को बाहर पा सकेंगे ।


मंगलवार, 21 जनवरी 2020

जीवन का फंडा...


      15-16 वर्ष की उम्र के एक बालक से उसके पिता ने एक पुराना कपड़ा दिखाते हुए उसकी कीमत पूछी, बच्चे ने अंदाज से उसकी कीमत 100/-रु बताई । ठीक है, अब तुम इसे 200/-रु. में बेचकर दिखाओ, कहते हुए उसके पिता ने वो कपडा उस बच्चे को दे दिया । उस बालक ने तब उस कपड़े को व्यवस्थित रुप से साफ़ कर अच्छी तरह से तह करके रखा और अगले दिन उसे लेकर वह रेलवे स्टेशन गया, जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह कपड़ा दो सौ रु में उसने बेच दिया ।


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      कुछ दिन बाद उसके पिता ने फिर उसे वैसा ही दूसरा कपड़ा दिया और अब उसे 500/-रु में बेचने को कहा । तब उस बालक ने अपने एक पेंटर दोस्त की मदद से उस कपड़े को रंगवाकर उस पर सुन्दर चित्र बनवाया और एक गुलज़ार बाजार में उसे बेचने के लिए पहुंच गया । एक व्यक्ति ने वह कपड़ा 500/-रु में खरीदने के साथ ही उसे 100/-रु ईनाम भी दिया ।

       जब बच्चा वापस आया तो उसके पिता ने फिर एक कपड़ा हाथ में दे दिया और उसे दो हज़ार रु में बेचने को कहा । इस बार उस बच्चे को पता था कि इस कपड़े की इतनी ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है । उसके शहर में  फिल्म की शूटिंग के लिए एक नामी कलाकार आई थीं । वह बच्चा जुगत भिडाकर उस कलाकार के पास पहुंच गया और उसी कपड़े पर उनके ऑटोग्राफ ले आया । उसके बाद उस बालक ने उस कपड़े की बोली लगाई । बोली दो हज़ार रु. से शुरू हुई और एक कद्रदान ने वह कपड़ा 9000/-रु में खरीद लिया ।

       रकम लेकर वह बच्चा जब घर पहुंचा तो खुशी से पिता की आंखों में आंसू आ गए । उन्होंने तब अपने बेटे से पूछा कि इतने दिनों में इन कपड़ों को बेचते हुए तुमने क्या सीखा ? तब बच्चा बोला -  पहले खुद को समझो, अपनी क्षमता को पहचानो और फिर पूरे मनोयोग से मन्ज़िल की और बढ़ जाओ, क्योकि जहां चाह होती है, वहाँ राह भी निकल ही आती है ।'

       पिता बोले कि तुम बिलकुल सही हो, मगर मेरा उद्देश्य तुम्हें यह समझाना भी था कि कपड़ा मैला होने पर इसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धो कर साफ़ करना पड़ा, फिर और ज्यादा कीमत तब मिली जब एक पेंटर ने उस पर अपना हुनर चस्पा कर दिया और उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी कलाकार ने उस पर अपने नाम की मोहर लगा दी ।

      तो विचार करें कि कोई भी वो काम जिसमें हमारी रुचि है या वो जो हम कर रहे हैं उसे कैसे इतना उपयोगी बनाएं कि उससे सम्बन्धित व्यक्ति हमें अपने उस काम के एवज में ज्यादा से ज्यादा कीमत प्रसन्नतापूर्वक दे सके । निश्चय ही यदि इस दिशा में ईमानदार प्रयास हमारे द्वारा किया जा सके तो यह बिल्कुल सम्भव है । 

और अब इस नन्हे कलाकार से भी मिल लें...

भगवान भोलेनाथ का साम्राज्य...

      वैसे तो समूचि सृष्टि पर ही भगवान का साम्राज्य रहता है किंतु इस बार महाशिवरात्रि पर विख्यात ज्योतिर्लिंगों के संदर्भ में ऐसी ...