रविवार, 19 जनवरी 2020

विचित्र किंतु सत्य...


      12-13 वर्ष की खेलने-कूदने की उम्र में खेल-खेल में फातिमा अपने अब्बू के ही यहां प्रेग्नेंट हो गई, तो तुरन्त ही उसके अब्बूजान ने पंक्चर पकाने वाले अब्दुल से उसका निकाह करा दियाकुछ साल बाद अब्दुल ने गुस्से में आकर फातिमा को ट्रिपल तलाक दे दियाचतुर  मौलाना ने शरियत का हवाला देकर फातिमा से हलाला कर उसे अपनी हवस का शिकार बनाया फिर कुछ समय बाद मौलाना ने फातिमा को ट्रिपल तलाक़ दे दियाहलाला कर लौटी फातिमा को अब्दुल ने फिर शादी कर अपनी बीवी बना लिया फिर कुछ दिनों बाद दोबारा अब्दुल ने ट्रिपल तलाक दे दिया, फिर परेशान फातिमा ने मुर्गीवाले रहमान से दूसरी शादी कर ली, लेकिन कुछ समय में मुर्गीवाला रहमान मर गयाफातिमा अब भंगार वाले फखरुद्दीन की तीसरी बीवी बनकर रहती है  और अब तक फातिमा के सब मिलाकर 15 बच्चे मौजूद हैं !

     तो अब आखिर फातिमा के बच्चें किसे अपना अब्बू साबित करेंगेकौनसे बाप का वे आधार कार्ड दिखाएंगे अकेली फातिमा के 15 बच्चों के सामने बाप किसको बताये ये बड़ा सवाल हैअब्दुल को, मौलाना कोरेहमान कोफखरुद्दीन को या फिर और किसी आदमी को  ?

      आप ही बताएं- कोई आसान है क्या फातिमा के बच्चों के लिये....?  और अब सरकार NPR और NRC के द्वारा इन्हें अपना वजूद साबित करने के लिये कह रही है । इसीलिए वर्तमान अब्दुल आज फिर जोर-जबर्दस्तीपूर्वक संविधान को बचाने निकले हैं ।


नजर एक... नजरिये अनेक.






अन्न का सदुपयोग



गुरुवार, 16 जनवरी 2020

मनुष्य ही नहीं जानवरों में भी प्रभुभक्ति के भाव..


        किसी मस्जिद में एक नाग एक बिल में रहता था । प्रतिदिन पांच बार नमाज सुनताप्रतिदिन की तक़रीर भी ध्यान लगाकर सुनता था । एक दिन उसका मन हुआ कि नमाज की जब इतनी महिमा है तो एक दिन मैं भी नमाज पढ़ूं, शायद मुझे भी जन्नत मिल जाए ।

       यह सोचते हुए एक दिन नमाज के समय बाहर निकलकर नमाजियों की लाईन में लगने चल पड़ा । पर जैसे ही नमाजियों ने वहाँ नाग देखा तो डंडे लेकर उसे मारने दौड़ पडे, अब नाग आगे-आगे और नमाजी डंडे लेकर पीछे-पीछे भागे

       इधर भागते-भागते नाग को एक पुराना सा मंदिर दिखा । वो वहीं घुसकर शिवलिंग से लिपट गया और उसकी जान बच गई । इधर भक्तों ने जब शिवलिंग पर नाग लिपटा देखा कोतूहल सा मच गया, वहाँ भी भीड़ जमा हो गयी लेकिन इस भीड में लोग उसकी आरती-पूजा करने लगे और उसे ला-लाकर दूध पिलाने लगे ।
       अब नाग सोच रहा था कि मैं भी कहाँ फंसा पड़ा थामैं तो नमाज पढ़ना चाहता था पर उन्होंने लट्ठ लेकर दौड़ा दिया और मुझे पत्थर मारने लगे । यहाँ इन पत्थर के भोलेनाथ की शरण में दो घड़ी क्या आया स्वयं ही नाग से शेषनाग हो गया । शायद यही अंतर है इस्लाम और सनातन धर्म मे...


इधर देखें इन वानर राज को तल्लीनता पूर्वक अपनी ईषभक्ति में-


     और यहाँ यह U.P. का एक छोटा सा शिव मंदिर है जहाँ एक निश्चित समय पर प्रतिदिन एक बैल (नंदी) आकर परिक्रमा करता है और बिना किसी गिनती या जपमाला के किसी मशीन  की गणना के समान पूरी 108 प्रदक्षिणा यह नंदी लगाता है, जिन लोगों ने इसकी गिनती की हैं वे आश्चर्यचकित हैं...



मंगलवार, 14 जनवरी 2020

रोचक मकर संक्रान्ति...



      जान लीजिये कि मकर संक्रान्ति पर्व अब 15 जनवरी को क्यों आने लगा है ?  जबकि यह वर्ष 2080 तक अब हर वर्ष 15 जनवरी को ही आता रहेगा । विगत 72 वर्षों से प्रति वर्ष मकर संक्रांति हम 14 जनवरी को ही देखते आ रहे हैं । जबकि 2081 से आगे के 72 वर्षों तक अर्थात सन् 2153  तक यही मकर संक्रान्ति 16  जनवरी को आती रहेगी ।

       ज्ञातव्य है कि- सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश (संक्रमण) का दिन मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है । इस दिन से  मिथुन राशि तक में सूर्य के बने रहने पर सूर्य उत्तरायण का तथा कर्क से धनु राशि में सूर्य के बने रहने पर इसे दक्षिणायन का माना जाता है ।

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        सूर्य का धनु से मकर राशि में संक्रमण प्रति वर्ष लगभग 20 मिनिट विलम्ब से होता है । स्थूल गणना के आधार पर तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का तथा  72  वर्षो में पूरे 24 घंटे का हो जाता है । यही कारण हैकि अंग्रेजी तारीखों के मान से  मकर-संक्रांति का पर्व 72 वषों के अंतराल के बाद एक-एक तारीख आगे बढ़ता रहता है । यदि हम बहुत पहले कि बात करें तो लगभग 1700 वर्ष पूर्व यही मकर संक्रांति 22 दिसम्बर को मनाई जाती थी ।

         अतः यह धारणा पूर्णतः भ्रामक है कि मकर संक्रांति का पर्व  14 जनवरी को ही आता है । लेकिन चूंकि 72 वर्ष की इस अवधि में तकरीबन इंसानी जीवन सिमट जाता है और हममें से लगभग सभी ने इसे 14 जनवरी को ही अनिवार्य रुप से आते देखा है जबकि बाकि किसी भी पर्व-त्यौंहारों में तारीख का इतना फिक्सेशन हमने कभी नहीं देखा इसलिये हमें लगता रहा है कि मकर संक्रान्ति तो 14 जनवरी को ही फिक्स आती है, जबकि यह परिवर्तन इस रुप में परिवर्तित होता रहा है और वर्तमान जानकारी के अनुसार आगे भी संभवतः होता ही रहेगा ।

बुरी नजर से बचाव के लिये नींबू-मिर्ची का टोटका अब 
सिर्फ घर-दुकान या ट्रकों तक ही सीमित नहीं रह गया है...

संक्रति पर्व पर देखिये विश्वस्तरीय पतंग फेस्टिवल...



सोमवार, 13 जनवरी 2020

इस गुप्त नवरात्री में कीजिये देवी को प्रसन्न


            हिन्दू धर्म में नवरात्र मां दुर्गा की साधना के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्र के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते हैं। तंत्र साधना आदि के लिए गुप्त नवरात्र बेहद विशेष माने जाते हैं। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। इस नवरात्रि के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है।

            शिवपुराण के अनुसार पूर्वकाल में राक्षस दुर्ग ने ब्रह्मा को तप से प्रसन्न कर चारों वेद प्राप्त कर लिए। तब वह उपद्रव करने लगा। वेदों के नष्ट हो जाने से देव-ब्राह्मण पथ भ्रष्ट हो गए, जिससे पृथ्वी पर वर्षों तक अनावृष्टि रही।पृथ्वी पर रूद्र, वरुण, यम आदि का प्रकोप बढ़ने लगता है। इन विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना की जाती है ।


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            सतयुग में चैत्र नवरात्र, त्रेता में आषाढ़ नवरात्र, द्वापर में माघ, कलयुग में आश्विन की साधना-उपासना का विशेष महत्व रहता है। मार्कंडेय पुराण में इन चारों नवरात्रों में शक्ति के साथ-साथ इष्ट की आराधना का भी विशेष महत्व है । 

            देवताओं ने मां पराम्बा की शरण में जाकर दुर्ग का वध करने का निवेदन किया। मां ने अपने शरीर से काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला, धूमावती, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी नाम वाली दस महाविद्याओं को प्रकट कर दुर्ग का वध किया। दस महाविद्याओं की साधना के लिए तभी से गुप्त नवरात्र मनाया जाने लगा।

            गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि (माघ तथा आषाढ़) में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं ।

            "ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।

        दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते “सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित: ।

            मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: ॥”

           इस नवरात्र में देवी साधक और भक्त--- 'ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे नम:' मंत्र जाप करें।

             मां काली के उपासक---- 'ऊं ऐं महाकालाये नम:' मंत्र का जाप करें।

            व्यापारी लोग----'ऊं हीं महालक्ष्मये नम:' मंत्र का जाप करें।

            विद्यार्थी---- 'ऊं क्लीं महासरस्वतये नम:' मंत्र जपें।
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गुप्त नवरात्र 2016

            आषाढ़ नवरात्र गुप्त नवरात्रों के नाम से भी जाने जाते हैं. आषाढ़ महीने यानी जून और जुलाई  माह में पड़ने के कारण इन नवरात्रों को आषाढ़ नवरात्र कहा जाता है, हालाँकि देश के अधिकतर भाग में गुप्त नवरात्रों के बारे में लोग नहीं जानते हैं. उत्तरी भारत जैसे हिमाचल प्रदेश, पंजाब , हरयाणा, उत्तराखंड के आस पास के प्रदेशों में गुप्त नवरात्रों  में माँ भगवती की पूजा की जाती है. माँ भगवती  के सभी 9 रूपों की पूजा नवरात्रों के भिन्न – भिन्न दिन की जाती है , अतः आइये देखते हैं  इन दिनों में किस देवी की पूजा  कब की जानी चाहिए---

            5 जुलाई (मंगलवार) 2016 : घट स्थापन एवं माँ शैलपुत्री पूजा

            6 जुलाई (बुधवार) 2016 : माँ ब्रह्मचारिणी पूजा

            7 जुलाई (बृहस्पतिवार) 2016 : माँ चंद्रघंटा पूजा

            8 जुलाई (शुक्रवार) 2016: माँ कुष्मांडा पूजा

            9 जुलाई (शनिवार) 2016: माँ स्कंदमाता पूजा

            10 जुलाई (रविवार)  2016: : माँ कात्यायनी पूजा

            11 जुलाई (सोमवार)  2016:  माँ कालरात्रि पूजा

            12 जुलाई(मंगलवार) 2016 : माँ महागौरी पूजा, दुर्गा अष्टमी

            13 जुलाई (बुधवार) 2016 : माँ सिद्धिदात्री

            14 जुलाई (बृहस्पतिवार)  2016: नवरात्री पारण
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गुप्त नवरात्र पूजा विधि---

            मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

गुप्त नवरात्री में सिद्धि के लिए गुप्त स्थान या सिद्ध श्मशान-
            यह साधनाएं बहुत ही गुप्त स्थान पर या किसी सिद्ध श्मशान में की जाती है । दुनियां में सिर्फ चार श्मशान घाट ही ऐसे हैं जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है। ये हैं तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) का श्मशान, त्रयंबकेश्वर (नासिक) और उज्जैन स्थित विक्रांत भैरव या चक्रतीर्थ श्मशान ।

            गुप्त नवरात्रि में यहां दूर-दूर से साधक गुप्त साधनाएं करने आते हैं। नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृद्धि करने के लिए अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं।
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गुप्त नवरात्रि का महत्त्व ---

            देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है । कहा जाता है कि मां के नौ रूपों की भक्ति करने से हर मनोकामना पूरी होती है। नौ शक्तियों के मिलन को ही नवरात्रि कहते हैं। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में 4 माह नवरात्रि के लिए निश्चित हैं।

            मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधनाकाल नहीं हैं। श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं। इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ‘दुर्गावरिवस्या’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं। ‘शिवसंहिता’ के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति मां पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं। गुप्त नवरात्रों के साधनाकाल में मां शक्ति का जप, तप, ध्यान करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं नष्ट होने लगती हैं।

            गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।गुप्त नवरात्र में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी। इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्रों में साधना की थी। शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुलदेवी निकुम्बाला की साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है ||

            गुप्त व चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर होता है। धार्मिक दृष्टि से हम सभी जानते हैं कि नवरात्र देवी स्मरण से शक्ति साधना की शुभ घड़ी है। दरअसल, इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु। जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं। सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है।  नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं। जिससे इंसान निरोगी होकर लंबी आयु और सुख प्राप्त करता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार गुप्त नवरात्र में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है। देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप है। दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है। यह दमन या अंत होता है शत्रु रूपी दुर्गुण, दुर्जनता, दोष, रोग या विकारों का। ये सभी जीवन में अड़चनें पैदा कर सुख-चैन छीन लेते हैं। यही कारण है कि देवी दुर्गा के कुछ खास और शक्तिशाली मंत्रों का देवी उपासना के विशेष काल में जाप शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी भय बाधा का नाश करने वाला माना गया है ।

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सभी’नवरात्र’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक किए जाने वाले पूजन, जाप और उपवास का प्रतीक है- ‘नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते’। देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं। नवरात्र के नौ दिनों तक समूचा परिवेश श्रद्धा व भक्ति, संगीत के रंग से सराबोर हो उठता है। धार्मिक आस्था के साथ नवरात्र भक्तों को एकता, सौहार्द, भाईचारे के सूत्र में बांधकर उनमें सद्भावना पैदा करता है।

गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां---

            गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं ।


मारवाडी फटाके...




            सेठाणीजी नाराज होकर बोली - "जो म्हारो ब्याव कोई असली राक्षस सु भी हो जातो ना; तो भी वो मन्ने थारैसुं जादा सुखी रांखतो ।"

            मारवाड़ी सेठजी - यो तो बिलकुल ही कोनी हो सकतो थो । 


            सेठाणीजी - क्यू कोनी हो सकतो थो ? 


            सेठजी - अये बावळी ! आपणा लोगां में एक ही गोत्र में ब्याव कोनी होवै. ।


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            एक बार एक Punjabi कुए में गिर गया... ...और जोर जोर से रोने लगा  !

            एक मारवाड़ी वहाँ से जा रहा था उसने आवाज सुनी तो रुका और बोला :  "कुण है भाई ?"

            Punjabi : अस्सी हाँ !

            मारवाड़ी:  "भाई ! थे एक-दो होता,  तो काड देतो...

            80 तो म्हारै बाप से बी कोणी निकळै !"  पड्या रेओ !




मारवाडी सीख :
                              
           1.   चौखी संगत में उठणो बैठणो । 

            2.   काम स काम राखणो ।  
                  
            3.   ऊड़तो तीर नही पकडनो । 

            4.   घणो लालच कोनी करणो । 

            5. सोच समझकर पग राखणो ।

            6. रास्ते आणो, रास्ते जाणो ।   
 
            7. जितो हो सके उतो कम बोलणो ।

            8. छोटा-मोटा को कायदो राखणो।
 
            9.   जितो पचे उतो ई खाणो । (पेट खुदको होवे ।)
   
            10.  पूच्छ्या बीना सलाह नी देणो । 

            11.  पराई पंचायती नी करणी ।

            12.  आटा मे लूण समावे, लूण मे आटो कोनी ।

            13.  पगा बलती देखणी ढूंगा बलती कोणी । 

            14.  बीच में ही लाडे की भुवा नी बणनो ।

            15.  सुणनी सबकी करणी मन की ।



अठे हर कोई भरे बटका
घुमाबा नहीं ले जावां, तो घराळी भरे बटका ।
घराळी रो मान ज्यादा राखां, तो माँ भरे बटका ।
कोई काम कमाई नहीं करां, तो बाप भरे बटका ।
पॉकेट मनी नहीं देवां, तो बेटा भरे बटका ।
कोई खर्चो पाणी नहीं करां, तो दोस्त भरे बटका ।
थोड़ो सो कोई न क्यूं कह दयां, तो पड़ौसी भरे बटका ।
पंचायती में नहीं जावां, तो समाज भरे बटका ।
जनम मरण में नहीं जावां, तो सगा संबंधी भरे बटका ।
छोरा छोरी नहीं पढ़े, तो मास्टर भरे बटका ।

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पुरी फीस नहीं देवां, तो डॉक्टर भरे बटका ।
गाड़ी का कागज पानड़ा नहीं मिले, तो पुलिस भरे बटका ।
मांगी रिश्वत नहीं देवां, तो अफसर भरे बटका ।
टाइम सूं उधार नहीं चुकावां, तो सेठ भरे बटका ।
टेमूं टेम किश्त नहीं चुकावां, तो बैंक मैनेजर भरे बटका ।
नौकरी बराबर नहीं करां, तो बॉस भरे बटका ।
फेसबुक पर लाइक कमेंट नहीं करां, तो फ्रेंड भरे बटका ।
अब थे ही बताओ, जावां तो कठे जावां,
अठे हर कोई भरे बटका, अठे हर कोई भरे बटका।
 


शनिवार, 11 जनवरी 2020

मददगार...!

      सुबह जब में अपने घर से निकला, रास्ते के खंभे पर एक कागज चिपका देखकर जिज्ञासावश उसमें लिखा पढने रुका तो उसमें लिखा था, कल शाम अंधेरे की शुरुआत में मुझ गरीब का आखिरी 50/- रु. का नोट यहीं कहीं गिर गया है जिसे मैं नहीं ढूंढ पा रही हूँ । मेरे लिये वो कितना जरुरी था ये मैं किसी को बता भी नहीं सकती । यदि कभी आपको मेरा वो 50/- रु. का नोट मिल जावे तो कृपया अंदर की गली में खोली नं. 00 में लाकर दे दें, भगवान आपका भला करेंगें ।

      कुछ सोचते हुए मैंने अपनी जेब से 50/- रु. का नोट निकालकर अलग रखा और गली में इस खोली तक पहुँचा । वहाँ 75-80 वर्ष की एक कृषकाय अम्माजी दिखीं । मैंने उन्हें वो 50/- रु. का नोट देते हुए कहा कि आपका ये नोट मुझे मिला था और खम्भे पर आपका पत्र व पता देखकर मैं यहाँ आपको देने आया हूँ । मेरी बात सुनते ही वे अम्माजी रो पडीं और बोली- बाबूजी, न जाने कौन भला आदमी वहाँ ऐसा लिखकर टांग गया है, सुबह से कम से कम 10 लोग आकर मुझे जबरदस्ती 50/-, 50/-, रु. दे गये हैं । मेरे बहुत आग्रह करने पर उन्होंने मुश्किल से मुझसे वे 50/-, रु. ले लिये, लेकिन मुझसे बोली- बाबूजी आप मेहरबानी करके जाते-जाते वो चिट्ठी वहाँ से हटा देना । मैं उनको हाँ भरकर ही वहाँ से निकल पाया ।

     रोड पर आते हुए एक पल के लिये सोचा कि मैं वो चिट्ठी अब वहाँ से हटा दूं किंतु फिर यह सोचते हुए कि क्या मालूम किसने इनके लिये नेकी की ये राह चुनी है. मैं इसे यहाँ से हटाकर उसके इस नेक अभियान में क्यों बाधक बनूं । सोचते हुए मैं उस चिट्ठी को वहीं देखते हुए अपने रास्ते आगे बढ गया ।

अब इस मददगार फौज से मिलकर देखें कि ये गरीब ठंड से तो नहीं किंतु इन दानदाताओं के एहसान के बोझ से जरुर मर जाएगा-

और इस सुंदर से वीडिओ में देखिए मदद की इस उच्चतम भावना का 
पशु-पक्षियों तक में जीवंत प्रमाण...


बुधवार, 8 जनवरी 2020

ये पत्नियां...

       आज सुबह भाईसाहबभाभीजी के साथ सुबह की सैर  पर निकले, बगीचे के आधे चक्कर के बाद भाभीजी बेंच पर बैठ गई । भाईसाहब कुछ आगे निकल गए थे.. भाभीजी ने उंगली से इशारा कर के भाईजी को बुलाया. भाईजी वापस लौटेऔर पूछा- "क्या बात है ?"  तो  भाभीजी  बोली... "कुछ नही... बस यूं ही...!"

       भाभीजी,  वहीं बैठी रहीं... भाईजीफिर टहलने के लिए आगे बढ़े... इस बार भाईजीपिछली बार से कुछ और आगे बढ़े तभी भाभीजी ने फिर उँगली हिलाकर बुलाया... भाईजीके लौटकर पूछने पर फिर वही जवाब.. इस बार भाईजी पहले से भी कुछ और अधिक आगे बढ़े कि भाभीजी ने फिर उंगली का इशारा किया... इसबार भाईजी ने लौटकर गुस्से से पुछा... "क्या बात है...बार-बार उंगली के इशारे से क्यों बुला रही हो....?"


       तो भाभीजीबड़ी इत्मिनान भरी मासूमियत से बोली..."कुछ खास नहींमैं तो बस उंगली की रेंज चैक कर रही थी कि अब इस उम्र में सिग्नल कितनी दूर तक काम कर रहा है..?     



प्रेग्नेंसी पर मिलने वाली शासकीय सब्सिडी का लाभ लेने जाती 
ये विदेशी पत्नियां...

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और देखिए इन इजाजत पसंद पत्नीजी को...



विचित्र किंतु सत्य...

      12-13 वर्ष की खेलने-कूदने की उम्र में खेल-खेल में फातिमा अपने अब्बू के ही यहां प्रेग्नेंट हो गई ,  तो तुरन्त ही उसके  अब्बूजान न...