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रविवार, 29 जनवरी 2017

चैन की नींद


  
             दोपहर को मैं बरामदे में बैठा था कि तभी एक बढ़िया नस्ल का हष्ट पुष्ट लेकिन बेहद थका सा कुत्ता कम्पाउंड में दाखिल हुआ । गले में पट्टा भी था, मैंने सोचा जरूर किसी अच्छे घर का पालतू कुत्ता है ।  मैंने उसे पुचकारा तो वह पास आ गया ।  मैंने उसपर प्यार से हाथ फिराया तो वो पूँछ हिलाता वहीं बैठ गया ।
 
            बाद में जब उठकर मैं अंदर गया तो वह कुत्ता भी मेरे पीछे-पीछे हॉल में चला आया और खिड़की के पास अपने पैर फैलाकर बैठा और मेरे देखते-देखते सो गया ।
 
            मैंने भी हॉल का द्वार बंद किया और सोफे पर आ बैठा ।  करीब एक घंटे सोने के बाद कुत्ता उठा और द्वार की तरफ गया तो उठकर मैंने द्वार खोल दिया । वो बाहर निकला और चला गया । मैंने सोचा जरूर अपने घर चला गया होगा ।
 
            अगले दिन उसी समय वो फिर आ गया,  खिड़की के नीचे एक घंटा सोया और चला गया । उसके बाद वो रोज आने लगा । आता, सोता और फिर चला जाता । कई दिन गुजर गए तो मेरे मन में उत्सुकता जागी कि आखिर किसका कुत्ता है ये  ?
 
            एक रोज मैंने उसके पट्टे में एक चिठ्ठी बाँध दी जिसमें लिख दिया "आपका कुत्ता रोज मेरे घर आकर सोता है ।  ये आपको मालूम है क्या ?"
 
            अगले दिन रोज के समय पर कुत्ता आया तो मैंने देखा कि उसके पट्टे में एक चिठ्ठी बँधी है  उसे निकालकर मैंने पढ़ा ।
 
            उसमे लिखा था- "वो एक अच्छे घर का कुत्ता है, मेरे साथ ही रहता है लेकिन मेरी बीवी की दिनरात की किटकिट, पिटपिट, चिकचिक, बड़बड़ के कारण  वो थोड़ी बहुत तो नींद हो जाए  ये सोचकर रोज आपके पास चला आता है ।  कल से मैं भी उसके साथ आने लगूँ क्या ? कृपया पट्टे में चिठ्ठी बाँधकर आपकी सहमति की सूचना देने का कष्ट करें !"

शनिवार, 28 जनवरी 2017

असमंजस


होंठो पर तो है हँसी
फिर आँखें नम क्यों  है
पास है हर ख़ुशी
फिर भी कुछ गम क्यों है. . .

राहें तो बहुत आती है नज़र
पर जिस पे चलना है वो अनजान क्यों है
बड़ी कठिन है सच की डगर
झूँठ की राह आसान क्यों है. . .

आज गैर अपने है और अपने गैर हो गए
समझदार होकर भी हम नादान क्यों है
पास आने की बजाय दूर हो रहे
पढ़ लिखकर भी हम अज्ञान क्यों है. . .

जन्म ले बेटा उनके घर
हर पिता का ये अरमान क्यों है
बेटिया सिर्फ दहेज़ की पहचान क्यों है
रोज़ देखते है जुल्म मासूमो पर
फिर भी हम बेजुबान क्यों है. . .

दिन रात दौड़ रहे पैसों की खातिर
खुशियां पैसों का मुकाम क्यों है
आज हर किसी की चाहत है अमीरी
ये पैसा इतना महान  क्यों है. . .

गायब सी हो गयी हमारी अपनी भाषा
विदेशी भाषा होंठों की शान क्यों है
लोग कहते है हम नहीं बदले
ज़माना बदल रहा है
फिर बदला-बदला सा हर इंसान क्यों है.

सोर्स - WhatsApp

बुधवार, 25 जनवरी 2017

दांव...!


            एक्सप्रेस ट्रेन करीब-करीब खाली ही चल रही थी । वकील साहब जिस AC III  कोच में बैठे थे उसमें भी बहुत कम यात्री थे और उनके वाले कूपे में तो उनके अलावा दूसरा कोई पैसेंजर नहीं था ।

           तभी एक सजी-धजी संभ्रांत सी दिखती एक महिला उसी कोच में उनके सामने वाली बर्थ पर आकर मुस्कुराते हुए उनके सामने बैठी । वकील साहब ने भी उसकी मुस्कान के प्रतिउत्तर में अपनी ओर से मुस्कराहट दी और अपनी किताब पढने में तल्लीन हो गये ।

 
            गाडी चलने के कुछ देर बाद वो महिला वकील साहब से बोली - "मिस्टर, चुपचाप अपनी चैन, पर्स, घड़ी व मोबाइल मुझे दे दो नहीं तो मैं चिल्लाऊँगी कि, तुमने मेरे साथ छेड़खानी की है।"

            वकील साहब ने शांति से अपने ब्रीफकेस से एक कागज निकाला और उसपर लिखा - "मैं मूक-बधिर हूँ, बोल और सुन
नहीं सकता हूँ ।  आप क्या कह रही हैं कृपया लिखकर मुझे बताएँ ।"

            महिला ने जो कहा था वो उसी कागज पर लिखकर पढने को दे दिया ।


            बडी तसल्ली से वकील साहब ने उस कागज को मोड़कर हिफाजत से अपनी जेब में रखा और बोले-" हाँ, अब चिल्लाओ कि मैंने तुम्हारे साथ छेड़खानी की है ।  अब तुम्हारा लिखित बयान
मेरे पास है।"

            यह सुनते ही वह महिला सकते में आगई और वहाँ से अगली बोगी की तरफ मुँह छुपाते हुए ऐसी भागी जैसे कोई भूत उसके पीछे लग गया हो।


          शिक्षा - कैसी भी विपरीत परिस्थिति हो यदि शांत चित्त रहकर उपाय सोचा जाए तो उससे अवश्य पार पाया जा सकता है । 



रविवार, 22 जनवरी 2017

एक था बचपन...


             बचपन में तीन तरह के कपड़े होते थे...
          स्कूल के, घर के और किसी खास अवसर के ।
 
और अब  - 
           कैज़ुअल,  फॉर्मल,  नॉर्मल,  स्लीप वियर,  स्पोर्ट वियर, पार्टी वियर, स्विमिंग, जोगिंग, वगैरह-वगैरह ।

          जिंदगी आसान बनाने चले थे । पर वह तो इन कपड़ों की तरह ही कॉम्प्लिकेटेड हो गयी है ।



 बचपन में पैसा जरूर कम था
पर साला उस बचपन में दम था ।

 अब पास महंगे से मंहगा मोबाइल है,
पर बचपन वाली गायब वो स्माईल है ।

न गैलेक्सी, न वाडीलाल, न नैचुरल था,
पर घर पर जमी आइसक्रीम का मजा ही कुछ ओर था ।

अपनी अपनी कारों में घुम रहें हैं हम,
पर किराये की उन साईकिलों का मजा ही कुछ और था ।

"बचपन में पैसा जरूर कम था
पर साला उस बचपन में दम था" 
 

आज कुछ फिर पुराना याद आया,
एक भूला तराना याद आया

 
घर की छत पर वो धूप जाड़े की,
बारिशों में नहाना याद आया

 
कितने अच्छे थे दोस्त बचपन के,
उनके घर रोज़ जाना याद आया

 
मौज मस्ती वो आवारागर्दी,
घर में फिर डांट खाना याद आया

 
गर्मियों की भरी दुपहरी में,
बाग़ से फल चुराना याद आया

 
रोज़ लगती थी ताश की बाज़ी,
हार कर मुँह फुलाना याद आया

 
दूर जा कर कहीं पे चोरी से,
रोज़ धुंआ उड़ाना याद आया

 
खिड़कियों के छुप के पर्दों में,
उसको चुप-चाप तकना याद आया

 
घर के पीछे थी रेल की पटरी,
गाड़ी का छुक-छुकाना याद आया

 
दादी नानी की डांट वो मीठी,
और फिर मुस्कुराना याद आया

 
घोड़े की ढाई घर की चालें वो,
ऊँट का टेढ़े जाना याद आया

 
उसके पीछे घर तलक जाना,
और फिर लौट आना याद आया

 
इम्तिहान के भी दिन वो क्या दिन थे,
दिल का वो धुक-धुकाना याद आया

 
खेल कर घर वो देर से आना,
रोज़ झूठा बहाना याद आया

 
घर में आतीं थीं मेरे दो चिड़ियाँ,
उनका वो चह-चहाना याद आया


वो भी क्या दिन थे खूब बचपन के,
एक गुज़रा ज़माना याद आया     


शनिवार, 21 जनवरी 2017

विश्वास...


             किसी जंगल में एक वृक्ष पर चिडा-चिडी घोसला बनाकर प्रेमपूर्वक रहते थे । एक दिन चिड़िया बोली - मुझे छोड़ कर कभी उड़ तो नहीं जाओगे ?
 
             चिड़े ने कहा - यदि मैं उड़ जाऊं तो तुम पकड़ लेना ।
            चिड़िया बोली - मैं तुम्हें पकड़ तो सकती हूँ, पर फिर पा तो नहीं सकती !
 
            यह सुन चिड़े की आँखों में आंसू आ गए । उसने उसी समय अपने पंख तोड़ दिए और चिडी से कहा अब हम हमेशा साथ रहेंगे ।
          लेकिन एक दिन जोर से तूफान आया, चिड़िया उड़ने लगी तभी चिड़ा बोला तुम उड़ जाओ मैं नहीं उड़ सकता  !
 
            अच्छा अपना ख्याल रखना कहकर चिड़िया उड़ गई !
 
           जब तूफान थमा और चिड़िया वापस आई तो देखा कि चिड़ा मर चुका था और एक डाली पर लिखा था - "काश वो एक बार तो कहती कि मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकती ।"  तो शायद मैं तूफ़ान आने से पहले नहीं मरता ।


बुधवार, 18 जनवरी 2017

गांव तुम्हारा - शहर हमारा...


          एक अमीर आदमी अपने बेटे को लेकर गाँव गया, ये दिखाने कि गरीबी कैसी होती है । गाँव की गरीबी दिखाने के बाद उसने अपने बेटे से पूछा - "देखी गरीबी ?"

            बेटे ने जवाब दिया - हमारे पास 1 dog है और उनके पास 10-10 गाये है । 

            हमारे पास नहाने की छोटी सी जगह है और उनके पास पूरे तालाब हैं ।

              हमारे पास बिजली है और उनके पास सितारे...

             हमारे पास जमीन का छोटा सा टुकडा है और उनके पास बडे बडे खेत......

             हम डिब्बे का पैक बासी खाना खाते हैं, और वो स्वयं उगाकर और ताजा तोडकर खाते हैं ।

             उनके पास अपने वास्तविक मित्र हैं । जबकि हमारे लिये बस कंप्यूटर ही हमारा मित्र है ।

             हमारे पास खुशियाँ खरीदने को पैसा है, उनके पास खुशियाँ है,  जिसके लिये उन्हें पैसे की जरुरत ही नहीं ।

             उनके पापा के पास बच्चों के लिऐ समय है पर पापा आपके पास समय ही नही है ।

              पापा एकदम चुप....!

            बेटे ने कहा ''Thanks पापा मुझे यह दिखाने के लिये कि हम कितने गरीब हैं...


सोमवार, 9 जनवरी 2017

भारतीय मुद्रा तब से अब तक


           किस-किस की जानकारी में है ये - प्राचीन भारतीय मुद्रा प्रणाली

           फूटी कौड़ी (Phootie Cowrie) से कौड़ी,

           कौड़ी से दमड़ी (Damri),

           दमड़ी से धेला (Dhela),

           धेला से पाई (Pie),

           पाई से पैसा (Paisa),

           पैसा से आना (Aana),

           आना से रुपया (Rupya) बना ।

           256 दमड़ी = 192 पाई = 128 धेला = 64 पैसा  (old) = 16 आना = 1 रुपया.

            प्राचीन मुद्रा की इन्हीं इकाइयों ने हमारी बोल-चाल की भाषा को   कई कहावतें दी हैं, जो पहले की तरह अब भी प्रचलित हैं ।  देखिए :
          

           ●   एक 'फूटी कौड़ी' भी नहीं दूंगा ।
 
           ●   'धेले' का काम नहीं करती हमारी बहू !

 
           ●   चमड़ी जाये पर 'दमड़ी' न जाये ।

 
           ●   'पाई-पाई' का हिसाब रखना ।

 
           ●   सोलह 'आने' सच ! आदि । 


गुरुवार, 5 जनवरी 2017

हँसते-हँसते (जन-धन खाता)


          कस्टमर -   जन धन में खाता खुलवाना है....!!

          बैंक मैनेजर -   खुलवा लो...!!

          कस्टमर -  क्या ये जीरो बैलेंस में खुलता है.....!!

          बैंक मैनेजर (मन ही मन में साला पता है फिर भी पूछ रहा है) - हाँ जी फ्री में खुलवा लो....!!


          कस्टमर  -  इसमें सरकार कितना पैसा डालेगी ?

          बैंक मैनेजर -  जी अभी तो कुछ पता नहीं....!!

          कस्टमर -  तो मैं ये खाता क्यों खुलवाऊँ ?

          बैंक मैनेजर -  जी मत खुलवाओ....!!

          कस्टमर -  फिर भी सरकार कुछ तो देगी.....!!

          बैंक मैनेजर -   आपको फ्री में ATM CARD दे देंगे.....!!

          कस्टमर -   जब उसमे पैसा ही नहीं होगा तो एटीएम का क्या करूँगा ?

          बैंक मैनेजर -  पैसे डलवालो भैया तुम्हारा खाता है.....!

          कस्टमर -   मेरे पास पैसा होता तो मैं पहले नहीं खुलवा लेता,  तुम खाता खोल रहे हो तो तुम डालो न पैसे.....!!

          😞
बैंक मैनेजर -   अरे भाई सरकार खुलवा रही है.....!!

          कस्टमर -   तो ये सरकारी बैंक नहीं है ?

          बैंक मैनेजर -   अरे भाई सरकार तुम्हारा बीमा फ्री कर रही है, पुरे लाख का,

          कस्टमर - (खुश होते हुए) अच्छा तो ये एक लाख मुझे कब मिलेंगे ?

          बैंक मैनेजर -  (गुस्से में) जब तुम मर जाओगे तब तुम्हारी बीबी को मिलेंगे.....!!

          कस्टमर -  (अचम्भे से) तो तुम लोग मुझे मारना चाहते हो ? और मेरी बीबी से तुम्हारा क्या मतलब है ?

          बैंक मैनेजर -  अरे भाई ये हम नहीं सरकार चाहती है...!!

          कस्टमर -   (बीच में बात काटते हुए) तुम्हारा मतलब सरकार मुझे मारना चाहती है ?

          बैंक मैनेजर -   अरे यार मुझे नहीं पता, तुमको खाता खुलवाना है या नहीं ?

          कस्टमर -  नहीं पता का क्या मतलब ? मुझे पूरी बात बताओ ।

          बैंक मैनेजर -  अरे अभी तो मुझे भी पूरी बात नहीं पता, मोदीजी ने कहा कि खाता खोलो तो हम खोल रहे हैं.....!!

          कस्टमर - अरे नहीं पता तो यहां क्यों बैठे हो, (जन धन के पोस्टर को देखते हुए) -  अच्छा ये 5000/- रु. का ओवरड्राफ्ट क्या है ?

          बैंक मैनेजर -  मतलब तुम अपने खाते से 5000/- रु. निकाल सकते हो,

          कस्टमर (बीच में बात काटते हुए) -  ये हुई ना बात, ये लो आधार कार्ड, 2 फोटो और निकालो 5000/- रु.......!!

          बैंक मैनेजर -   अरे यार ये तो 6 महीने बाद मिलेंगे.......!!

          कस्टमर -   मतलब मेरे 5000/- रु. का इस्तेमाल 6 महीने तक तुम लोग करोगे......!!

          बैंक मैनेजर -  भैया ये रुपये ही 6 महीने बाद आएंगे......!!

          कस्टमर -  झूठ मत बोलो, पहले बोला कि कुछ नहीं मिलेगा, फिर कहा एटीएम मिलेगा, फिर बोला बीमा मिलेगा, फिर बोलते हो 5000/- रु. मिलेंगे, फिर कहते हो कि नहीं मिलेंगे, तुम्हे कुछ पता भी है ?

          बैंक मैनेजर बेचारा -   अरे मेरे बाप कानून की कसम, भारत माँ की कसम, मैं सच कह रहा हूँ, मोदी जी ने अभी कुछ नहीं बताया है,.... तुम चले जाओ,...... खुदा की कसम, ... तुम जाओ,.... मेरी सैलरी इतनी नहीं है कि ....... एक साथ ब्रेन हैमरेज और हार्ट अटैक दोनो का ईलाज करवा सकूँ.......!!
सोर्स - WhatsApp.

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

ऐतिहासिकता यह भी...


            अकबर की महानता का गुणगान तो कई इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की औछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है ।

            अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती थी उसे दासियाँ छल कपटवश अकबर के सम्मुख ले जाती थी एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप की भतीजी छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा किरणदेवी था जिनका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज जी से हुआ।

            बाईसा किरणदेवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया जैसे ही अकबर ने बाईसा किरणदेवी को स्पर्श करने की कोशिश की किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा नीच... नराधम...  तुझे पता नहीं मैं उन महाराणा प्रताप की भतीजी हुं जिनके नाम से तुझे नींद नहीं आती है बोल तेरी आखिरी इच्छा क्या है अकबर का खून सुख गया कभी सोचा नहीं होगा कि सम्राट अकबर आज एक राजपूत बाईसा के चरणों में होगा अकबर बोला मुझे पहचानने में भूल हो गई मुझे माफ कर दो देवी तो किरण देवी ने कहा कि आज के बाद दिल्ली में नौरोज का मेला नहीं लगेगा और किसी भी नारी को परेशान नहीं करेगा अकबर ने हाथ जोड़कर कहा आज के बाद कभी मेला नहीं लगेगा उस दिन के बाद कभी मेला नहीं लगा ।
     
  
            इस घटना का वर्णन गिरधर आसिया द्वारा रचित सगत रासो मे 632 पृष्ठ संख्या पर दिया गया है बीकानेर संग्रहालय में लगी एक पेटिंग में भी इस घटना को एक दोहे के माध्यम से बताया गया है-
किरण सिंहणी सी चढी उर पर खींच कटार
भीख मांगता प्राण की अकबर हाथ पसार


धन्य है किरण बाईसा उनकी वीरता को कोटिशः प्रणाम !

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