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गुरुवार, 3 नवंबर 2011

बंटवारा (बोधकथा)

          पूर्व समय में शाम के झुरमुटे में शिकार से वापसी के दौरान किसी राज्य के राजा जब अपनी सेना से आगे-पीछे होने के कारण अकेले वापस आ रहे थे तब उन्होंने एक लकडहारे को अपनी बांसुरी की धुन में मगन गांव की ओर जाते हुए देखा । सामान्य बातचीत में राजा ने जब उससे यह पूछा कि उसकी आमदनी क्या  है और कैसे उसका गुजारा चलता है तो लकडहारा बोला- महाराज मैं चार मुद्राएँ रोज कमा लेता हूँ और उनमें से एक मुद्रा कुएं में फेंक देता हूँ, दूसरी मुद्रा मैं कर्ज में चुका देता हूँ, तीसरी मुद्रा को मैं उधार दे देता हूँ, और चौथी जमीन में गाड देता हुँ । राजा को उस लकडहारे के अपनी कमाई को उपयोग में लाने का यह तरीका समझ में नहीं आया लेकिन बात आगे बढने  के पूर्व ही उनका सेनापति अपने सैनिकों के साथ राजा को खोजते हुए उनके करीब आ गया और राजा अपने लश्कर के साथ अपने राज्य में वापस आ गये ।

          दूसरे दिन दरबार में राजा ने अपने सभी दरबारियों से लकडहारे के अपनी आमदनी को खर्च करने के इस तरीके का मतलब समझाने को कहा तो सभी विद्वान दरबारी इसका कोई भी संतोषप्रद उत्तर नहीं दे पाये । तब राजा ने सैनिकों को भेजकर उस लकडहारे को राज्य में बुलवाया और सभी दरबारियों के समक्ष अपनी कमाई की उन चार मुद्राओं के उपयोग के तरीके को विस्तार से समझाने को कहा तब लकडहारे ने अपनी आमदनी के उपयोग का तरीका बताते हुए कहा-

          महाराज पहली मुद्रा मैं कुएं में फेंक देता हूँ याने अपने परिवार के भरण-पोषण के काम में लाता हूँ, दूसरी मुद्रा से मैं कर्ज चुकाता हूँ याने मेरे माता पिता जिन्होंने मेरे जन्म से लगाकर मेरे जीवन में स्थापित होने तक मेरे लिये लगातार मेहनत की उनकी वृद्धावस्था में होने वाली सभी समस्याओं को दूर करने में काम में लाता हूँ, तीसरी मुद्रा मैं उधार दे देता हूँ याने अपने बच्चों की उचित शिक्षा-दिक्षा के काम में लाता हूँ और चौथी मुद्रा जिसे मैं जमीन में गाड देता हूँ अर्थात धर्म व समाज से जुडी वो सभी जिम्मेदारियां जहाँ मेरे योगदान की आवश्यकता होती है उस जगह उसका उपयोग कर लेता हूँ ।

          राजा के साथ ही सभी दरबारी भी लकडहारे के द्वारा अपनी आमदनी के बंटवारे के इस सूझ-बूझ पूर्ण उत्तर से अत्यन्त प्रभावित हुए और राजा ने भरपूर ईनाम के साथ ससम्मान उस लकडहारे को राजदरबार से विदा किया ।





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