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गुरुवार, 28 नवंबर 2019

मित्र का महत्व...

          किसी गांव में एक गाँव में एक व्यक्ति के पास 19 ऊंट थे । एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी । मृत्यु के पश्चात वसीयत पढ़ी गयी ।  जिसमें लिखा था - मेरे 19 ऊंटों में से आधे मेरे बेटे को, 19 ऊंटों में से एक चौथाई मेरी बेटी को और 19 ऊंटों में से पांचवाँ हिस्सा मेरे नौकर को दे दिए जाएँ ।

          सब लोग चक्कर में पड़ गए कि ये बँटवारा कैसे हो ? 19 ऊंटों का आधा अर्थात एक ऊँट काटना पड़ेगा, फिर तो ऊँट ही मर जायेगा । चलो एक को काट भी दिया तो बचे 18 उनका एक चौथाई साढ़े चार- साढ़े चार. फिर ? सब बड़ी उलझन में थे ।  फिर उनके पुराने मित्र को बुलाया गया ।


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          मित्र अपने ऊँट पर चढ़ कर आया, समस्या सुनी, थोडा दिमाग लगाया, फिर बोला इन 19 ऊंटों में मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो।

          सबने सोचा कि एक तो मरने वाला पागल था, जो ऐसी वसीयत कर के चला गया, और अब ये दूसरा पागल आ गया जो बोलता है कि उनमें मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो। फिर भी सब ने सोचा बात मान लेने में क्या हर्ज है।

          19+1=20 ऊँट हो गए । 20 का आधा 10,  बेटे को दे दिए । 20 का चौथाई 5, बेटी को दे दिए । 20 का पांचवाँ हिस्सा 4,  वो नौकर को दे दिए । कुल ऊंट बंटे 10+5+4=19 एक ऊँट फिर वापस बच गया, जो उनके मित्र का था और वो उसे लेकर वापस अपने गॉंव लौट गया । इस तरह 1 उंट मिलाने से बाकी 19 उंटो का बंटवारा सुख, शांति, संतोष व आनंद से हो गया । हम सब के जीवन में भी 19 ही ऊंट होते हैं-
          5 ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, नाक, जीभ, कान, त्वचा)
          5 कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, जीभ, मूत्रद्वार, मलद्वार)
          5 प्राण (प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान) और
          4 अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)


          इस प्रकार कुल 19 ऊँट होते हैं । और हमारा सारा जीवन  इन्हीं 19 ऊँटो के बँटवारे में उलझा रहता है । फिर जब तक उसमें मित्र रूपी ऊँट नहीं मिलाया जाता यानी जब तक दोस्तों, सगे-संबंधियों के साथ जीवन नहीं जिया जाता,  तब तक सुख, शांति, संतोष व आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती ।





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गुरुवार, 3 नवंबर 2011

बंटवारा (बोधकथा)

         पूर्व समय में शाम के झुरमुटे में शिकार से वापसी के दौरान किसी राज्य के राजा जब अपनी सेना से आगे-पीछे होने के कारण अकेले वापस आ रहे थे तब उन्होंने एक लकडहारे को अपनी बांसुरी की धुन में मगन गांव की ओर जाते हुए देखा । सामान्य बातचीत में राजा ने जब उससे पूछा कि उसकी आमदनी क्या  है और कैसे उसका गुजारा चलता है तो लकडहारा बोला- महाराज मैं चार मुद्राएँ रोज कमा लेता हूँ और उनमें से एक मुद्रा कुएं में फेंक देता हूँ, दूसरी मुद्रा मैं कर्ज में चुका देता हूँ, तीसरी मुद्रा को मैं उधार दे देता हूँ, और चौथी जमीन में गाड देता हुँ । 


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       राजा को उस लकडहारे के अपनी कमाई को उपयोग में लाने का यह तरीका समझ में नहीं आया लेकिन बात आगे बढने  के पूर्व ही उनका सेनापति अपने सैनिकों के साथ राजा को खोजते हुए उनके करीब आ गया और राजा अपने लश्कर के साथ अपने राज्य में वापस आ गये ।

          दूसरे दिन दरबार में राजा ने अपने सभी दरबारियों से लकडहारे के अपनी आमदनी को खर्च करने के इस तरीके का मतलब समझाने को कहा तो सभी विद्वान दरबारी इसका कोई भी संतोषप्रद उत्तर नहीं दे पाये । तब राजा ने सैनिकों को भेजकर उस लकडहारे को राज्य में बुलवाया और सभी दरबारियों के समक्ष अपनी कमाई की उन चार मुद्राओं के उपयोग के तरीके को विस्तार से समझाने को कहा तब लकडहारे ने अपनी आमदनी के उपयोग का तरीका बताते हुए कहा-

         
महाराज पहली मुद्रा मैं कुएं में फेंक देता हूँ याने अपने परिवार के भरण-पोषण के काम में लाता हूँ, दूसरी मुद्रा से मैं कर्ज चुकाता हूँ याने मेरे माता पिता जिन्होंने मेरे जन्म से लगाकर मेरे जीवन में स्थापित होने तक मेरे लिये लगातार मेहनत की उनकी वृद्धावस्था में होने वाली सभी समस्याओं को दूर करने में काम में लाता हूँ, तीसरी मुद्रा मैं उधार दे देता हूँ याने अपने बच्चों की उचित शिक्षा-दिक्षा के काम में लाता हूँ और चौथी मुद्रा जिसे मैं जमीन में गाड देता हूँ अर्थात धर्म व समाज से जुडी वो सभी जिम्मेदारियां जहाँ मेरे योगदान की आवश्यकता होती है उस जगह उसका उपयोग कर लेता हूँ ।

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होनहार...
एक सच यह भी...!
कमर-दर्द (पीठ के दर्द) से बचाव के लिये-

          राजा के साथ ही सभी दरबारी भी लकडहारे के द्वारा अपनी आमदनी के बंटवारे के इस सूझ-बूझ पूर्ण उत्तर से अत्यन्त प्रभावित हुए और राजा ने भरपूर ईनाम के साथ ससम्मान उस लकडहारे को राजदरबार से विदा किया ।      


ऐतिहासिक शख्सियत...

पागी            फोटो में दिखाई देने वाला जो वृद्ध गड़रिया है    वास्तव में ये एक विलक्षण प्रतिभा का जानकार रहा है जिसे उपनाम मिला था...