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इस ब्लाग परिवार के हमारे सदस्य साथी....

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

अब भी कायम है दुनिया में भरोसा


अब भी पेडों के भरोसे पक्षी
सब कुछ छोड जाते हैं

बसंत के भरोसे वृक्ष
बिल्कुल रीत जाते हैं

पतवारों के भरोसे नाव
सागर भी लांघ जाती है

बरसात के भरोसे बीज
धरती में समा जाते हैं



 और

अनजान पुरुष

के पीछे

सदा के लिये 

स्त्री चल देती है. 

मंगलवार, 26 मार्च 2013

खूनी होली

               भाऊ साहेब सिर से बहते खून के साथ डाक्टर के पास पहुँचे डाक्टर ने ड्रेसिंग करते हुए भाऊ साहेब से पूछा कि आपको यह चोट कैसे लगी ?  पहले तो भाऊ साहेब बात को टालने लगे किन्तु डाक्टर के अधिक आग्रह करने पर उन्होंने बताया कि इस बार मेरी पत्नी होली के त्यौंहार पर मायके गई हुई है तो मैं भी कुछ मटरगश्ती के मूड में ड्रिंक वगैरह करने के प्रोग्राम के साथ एक होटल में जा टिका । रात 11 बजे के करीब पास के रुम की एक महिला ने दरवाजा खटखटाया । मेरे दरवाजा खोलकर पूछने पर वो बोली - यहाँ के वातावरण में मुझे बहुत ठंड लग रही है आप प्लीज मेरी कुछ मदद कर दें । तब मैंने अपने कमरे का कम्बल उसे दे दिया । थोडी देर बाद वह महिला फिर दरवाजा खटखटाकर कहने लगी कि मेरी ठंड दूर नहीं हो रही है प्लीज आप कुछ करो । तब मैंने उसे अपना ओवरकोट भी दे दिया । अब आज जब मैं अपने घर में हथौडी से कील ठोक रहा था तब अचानक मेरे समझ में आया कि वास्तव में वह महिला उस समय मुझसे क्या चाह रही थी । बस मैंने झुंझलाहट में वो हथोडी अपने सिर पर दे मारी...     Happy Holi.



ब्लाग-जगत के सभी साथियों और

जिन्दगी के रंग ब्लाग के सभी पाठकों, समर्थकों और अपने 

सभी मित्रों-परिचितों को होली के इस रंगारंग पर्व की

                हार्दिक शुभकामनाएँ...

रविवार, 24 मार्च 2013

चकल्लस - सच झूठ की.


राजू के पापा एक रोबोट ले कर आये.

वह रोबोट झूठ पकड़ सकता था और झूठ बोलने वाले को गाल पर खीँच कर चांटा मार देता था.


आज राजू स्कूल से घर देर से आया था, पापा ने पूछा "घर लौटने में देर क्यो हो गयी?"


"आज हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस थी" राजू ने जवाब दिया...


रोबोट अचानक अपनी जगह से उछला और जमकर राजू के गाल पर चांटा मार दिया.


पापा हंसकर बोले, "ये रोबोट हर झूठ को पकड़ सकता है और झूठ बोलने वाले को चांटा भी मारता है. अब सच क्या है यह बताओ, कहाँ गए थे?"


"में फिल्म देखने गया था" राजू बोला


"कौन सी फिल्म?" पापा ने कड़ककर पूछा.


"बाल गणेश
"


चटाक!!! अभी राजू की बात पूरी भी नहीं हुई थी की उसके गाल पर रोबोट ने एक जोर का चांटा और मारा,


"कौन सी फिल्म?" पापा ने फिर पूछा


"आओ प्यार करें."


पापा ग़ुस्से में बोले "शर्म आनी चाहिए तुम्हे. जब में तुम्हारे जितना था तब ऐसी हरकत नहीं किया करता था."


चटाक!!! रोबोट ने फिर चांटा मारा, इस बार पापा के गाल पर.


यह सुनते ही मम्मी किचन में से आते हुए बोली "आख़िर तुम्हारा बेटा है ना, झूठ तो बोलेगा ही"


अब मम्मी की बारी थी, रोबोट उस दिशा में घूमा और चटाक!!!


शनिवार, 23 मार्च 2013

सच्चाई - जिन्दगी और मौत की...


जिन्दा थे तो किसी ने पास बैठाया नहीं,
अब सभी मेरे चारों ओर बैठे जा रहे हैं.

पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पूछा,
अब सभी आंसू बहाए जा रहे हैं.

एक रुमाल भी भेंट नहीं किया, जब हम जिन्दा थे,
अब शालें और कपडे उपर से उढाए जा रहे हैं.

सबको पता है कि ये शालें और कपडे इसके काम के नहीं,
पर फिर भी दुनियादारी निभाए जा रहे हैं.

कभी किसी ने एक वक्त का खाना तक नहीं खिलाया,
अब देशी घी मेरे मुँह में डाले जा रहे हैं.

जिन्दगी में एक कदम भी साथ न चल सका कोई,
अब फूलों से सजाकर कंधे पर उठाये जा रहे हैं.

आज पता चला कि मौत जिन्दगी से बेहतर है,
हम तो बेवजह ही जिन्दगी की चाह किये जा रहे थे.

गुरुवार, 21 मार्च 2013

वक्त कहाँ है ?


                  हर खुशी है लोगों के दामन में
                  पर हँसने के लिये वक्त नहीं.
 
                                                      दिन-रात दौडती दुनिया में, 
                                                      जिन्दगी के लिये वक्त नहीं. 
                 माँ की लोरी का एहसास तो है,                 
                 पर माँ को माँ कहने का वक्त नहीं. 
                                                         सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
                                                         पर उन्हें दफनाने का भी वक्त नहीं.
                 सारे दोस्तों के नाम मोबाईल में हैं,
                 पर दोस्ती के लिये वक्त नहीं.
 
                                                        गैरों की क्या बात करें,
                                                        जब अपने लिये ही वक्त नहीं.
                 आँखों में तो नींद भरी है,
                 पर सोने के लिये वक्त नहीं.
 
                                                        दिल है गमों से भरा हुआ,
                                                        पर रोने के लिये वक्त नहीं.
                 पराये एहसानों की क्या कद्र करें,                            
                 जब अपने सपनों के लिये ही वक्त नहीं. 
                                                        तू ही बता ए जिन्दगी,
                                                        इस जिन्दगी का क्या होगा ?
                कि हर पल मरने वालों को,                  
                जीने के लिये भी वक्त नहीं
                                                        भूख तो है, इच्छा भी, भोजन भी है,
                                                        पर उसे खाने के लिये वक्त नहीं.
                 हर चीज की हमको जल्दी है,
                 पर जल्दी के लिये भी वक्त नहीं.

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

महिला दिवस और रंगों का मेल ?

         
         महिला संगठन की 8 मार्च की मेरी पत्नी की सामूहिक मीटिंग में अधिक से अधिक रंग-बिरंगी साडी पहन कर शामिल होने का ड्रेसकोड सामने आया । यूँ तो इसमें कोई खास बात नहीं लगी किन्तु आज महिला-दिवस के अवसर पर जब दैनिक भास्कर न्यूज पेपर हाथ में आया तो यहाँ भी महिला सशक्तीकरण को रंगों से कुछ इस प्रकार से जुडा हुआ पढने में आया-


हरा रंग - जिन्दगी का प्रतीक
एक लीडर की जिजीविषा ही उसे आगे बढाती है.
स्त्री जिंदगी की मुश्किलों का सामना करना और उन्हे हराना बखूबी जानती है ।

बैंगनी रंग - रहस्य का प्रतीक
लीडर को रहस्य छुपाने का हुनर भी आना चाहिये.
स्त्री इस हुनर में पारंगत है । मन में कई रहस्य छुपाकर रख सकती है ।

नीला रंग - सच का प्रतीक
सच्चाई लीडर को कठिन परिस्थिति में भी मजबूत रखती है.
स्त्री सच का सामना करना जानती है और उसके लिये लडना भी ।

नारंगी रंग - प्रतिबद्धता का प्रतीक
प्रतिबद्धता, लीडर बनने के लिये सबसे बडी आवश्यकता.
स्त्री बचपन से ही प्रतिबद्ध, इसलिये उसमें यह गुण रचा-बसा होता है ।

जामुनी रंग - पूर्वाभास का प्रतीक
पूर्वाभास मुश्किलों से जूझने में मदद करता है.
स्त्री की छठी इन्द्री तेज होती है जो हर खतरे को सबसे पहले भांप लेती है ।


       निस्संदेह महिला सशक्तीकरण को इस प्रकार इन रंगों से जोड कर देखा गया है किन्तु फिर भी दिमाग में यह रहस्य कायम ही रह जाता है कि इस प्रस्तुति अथवा इस दिन के लिये (जैसे महिला मंडल की मीटिंग में बहुरंगी ड्रेसकोड के रुप में) रंगों को अतिरिक्त महत्व आखिर क्यों दिया गया ? जबकि पुरुषों की भी ऐसी अनेक विशेषताएँ दैनंदिनी जीवन में उसे उन्नति की ओर आगे बढाने में देखी व गिनी जाती हैं ।

      क्या विद्व पाठकों में कोई टिप्पणी के माध्यम से इस दिन हेतु रंगों के विशेष उल्लेख के सुस्पष्ट कारणों पर रोशनी डाल सकते हैं ?

      महिला सशक्तीकरण दिवस पर विशेष शुभकामनाओं सहित...

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