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शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

तमाशबीन या प्रयासरत


             एक गांव में आग लगी । सभी लोग उसको बुझाने में लगे हुए थे । वहीं एक चिड़िया अपनी चोंच में पानी भरती और आग में डालती, फिर भरती और फिर आग में डालती । एक कौवा डाल पर बैठा उस चिड़िया को देख रहा था । कौवा चिड़िया से बोला - "अरे पागल तू कितनी भी मेहनत कर ले,  तेरे बुझाने से ये आग नहीं बुझेगी ।"

             चिड़िया विनम्रता से बोली  "मुझे पता है मेरे बुझाने से ये आग नहीं बुझेगी, लेकिन जब भी इस आग का ज़िक्र होगा, तो मेरी गिनती आग बुझाने वालों में होगी और तुम्हारी तमाशा देखने वालों में होगी"।

            ऐसे ही समाज में हम सब भी कभी-कभी कौए की तरह यह कह/सोच कर अपना बचाव करते हैं कि 'अकेले हम समाज/देश को नही सुधार सकते, अकेले हमसे क्या होगा' ।

             सब जानते हैं कि मुश्किल है लेकिन क्या यह उचित नहीं है कि जब-जब भी गिनती हो और हमारा नाम लिया जाय तो समाज के उत्थान करने वालों में हो न कि तमाशा देखने वालों में ।


1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (22-08-2016) को "ले चुग्गा विश्वास से" (चर्चा अंक-2442) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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