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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

लघुकथा- धैर्य (धीरज)


कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय
टूक एक के कारने, श्वान घरे घर जाय ।

       एक व्यापारी जब अपने कार्यालय में मौजूद थे तो उनके किसी निकट परिचित के रेफरेंस पर एक बीमा एजेन्ट उनके पास पहुँचा । अपना परिचय देने के बाद एजेन्ट उस व्यापारी को बीमा पालिसी बेचने के लिये बीमे के लाभ बताने का प्रयास करने लगा । व्यापारी की उस बीमा पालिसी में कोई रुचि नहीं थी, किन्तु स्पष्ट मना कर देने पर उस परिचित को बुरा लगने का अंदेशा था अतः व्यापारी ने अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर बीमा एजेन्ट को बाद में आने को कहा । बीमा एजेन्ट अभिवादन करके चला गया और उस व्यापारी के बताये समय पर फिर आकर अपना प्रयास दोहराने लगा ।

      व्यापारी ने इस बार उसे थोडी बेरुखी से टालकर फिर अगली बार आने को कहा जब व्यापारी द्वारा निरन्तर दिखाई जाती बेरुखी और बाद में बुलाए जाने का यह सिलसिला 6-8 बार रिपीट हो चुकने के बाद भी एजेन्ट का उसके बुलाए समय पर आने व अपने प्रयास को दोहराने का सिलसिला बन्द नहीं हुआ तो अगली बार उस एजेन्ट के आते ही व्यापारी कुछ क्रोधित अवस्था में उठकर बाहर जाने लगा । सर एक बार आप इस पालिसी के लाभ समझ तो लें. कहते हुए एजेन्ट ने फिर अपनी कोशिश की । अब तो उन व्यापारी का गुस्सा उनकी बर्दाश्त के बाहर हो गया और उन्होंने उसे धकेलते हुए कहा- मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी तुम यहाँ से जाते हो कि नहीं ? आवेश में व्यापारी द्वारा अचानक धकेले जाने पर एजेन्ट अपना सन्तुलन नहीं रख पाया और गिर पडा । वहीं रखे एक स्टूल का कोना एजेन्ट के सिर से तेजी से टकराया और एजेन्ट के सर पर चोट का निशान दिखने लगा । अब व्यापारी महोदय की सिट्टी-पुट्टी गुम हो गई, ऐसा तो उन्होंने कभी चाहा ही नहीं था । ये क्या हो गया ?
  
       तभी एजेन्ट ने उठकर अपना घाव सहलाते हुए उन व्यापारी महोदय से कहा- कोई बात नहीं सर, यदि आपकी इच्छा नहीं है तो मैं चला जाता हूँ लेकिन बेहतर होता आप एक बार इसके लाभ समझ तो लेते । अत्यन्त लज्जित अवस्था में व्यापारी उस एजेन्ट को अपने केबिन में ले गये और चेक पर साईन करके उन्होंने उस बीमा एजेन्ट के सामने रखकर कहा- आप जो और जितने की पालिसी मेरे लिये बेहतर समझें उसका फार्म भरलें मैं साईन कर देता हूँ ।

      धीरज का परिणाम-   आशातीत सफलता.

        वैसे धीरज उस मनोवृत्ति का भी नाम है कि सडक पर गाडी चलाते समय जब हम अपने पीछे वाले ड्राईवर को इसका पालन करते देखते हैं तो मन ही मन उसकी प्रशंसा करते हैं और जब अपने आगे वाले ड्राईवर को इस मनोवृत्ति से गाडी चलाते देखते हैं तो उसे कोसने लगते हैं ।



11 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

शिक्षवर्धक पोस्ट ..

कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

.............

सुज्ञ ने कहा…

बेहद प्रेरणास्पद बोध कथा।

सुशील बाकलीवास ने कहा…

संगीताजी,
मैंने कल भी आपके सुझाए मुताबिक वर्ड वेरिफिकेशन को हटाने का प्रयास किया था और मुझे लगा कि तीन केटेगिरी जो प्रायः दिखाई देती हैं आपका मंतव्य उसे हटाने से था जिसे मैंने हटा भी दिया था । अब एक बार फिर प्रयास करता हूँ ।

सुज्ञजी,
आपको ये लघुकथा अच्छी लगी । धन्यवाद...

RAJENDRA ने कहा…

beema agent ko apne dheiry ka laabh mila

JHAROKHA ने कहा…

sir
ek bahut hi sachchai se bhari aapki baat bahut achhi lagi .vastav me kabhi ham log bhi aisa hi kar jaate hain. agle vyakti ki pareshaniyo ko najar andaaj kar dete jo ki galat baat hai .agar ham apne keemti samay se thoda sa waqt kisi ke kary ke liye de saken to iasme hamara kuchh bigadta nahi hai .ha!aane wale ko kasht alag hi de dete hain.
isi liye hamaare sansakaro me bhi dhairya ko
vishesh sthan diya gaya hai.
वैसे धीरज उस मनोवृत्ति का भी नाम है कि सडक पर गाडी चलाते समय जब हम अपने पीछे वाले ड्राईवर को इसका पालन करते देखते हैं तो मन ही मन उसकी प्रशंसा करते हैं और जब अपने आगे वाले ड्राईवर को इस मनोवृत्ति से गाडी चलाते देखते हैं तो उसे कोसने लगते हैं
bahut hi sarthak aalekh
poonam

POOJA... ने कहा…

आपका लेख बहुत ही सार्थक है, और अंत में, "धीरज" के बारे में इस तरह लिखना... बहुत ही अच्छा लगा
परन्तु जहाँ तक मैं, बीमा एजेंट्स या एम्.आर. या और कोई सेल्स वाला अंडा, इनके बारे में जानती हूँ, ये तो अक्सर ऐसे ही होते हैं, जब तक इन्हें कोई सीधे मना न कर दे या जब तक कोई इनकी पोलिसी या प्रोडक्ट ले न ले तब तक ये अपनी कोशिश जारी रखते हैं...

POOJA... ने कहा…

*उसे अंडा नहीं बन्दा पढ़े...

सुशील बाकलीवास ने कहा…

पूजाजी, ये उनका काम है और उसके लिये प्रयासरत रहने का उनका अपना तरीका. और फिर ऐसे ही कामों में तो शायद धीरज की सर्वाधिक आवश्यकता होती है ।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत सुन्दर और प्रेरक विचार.. आपके ब्लॉग पर आना अच्छा लगा...

मंजुला ने कहा…

bahut badia lekh ..thanks...
kabhi mere blog par bhi aaiye

MYFEELINGS ने कहा…

SAR AAP BAHUT ACHE VICHR WOLE HAI...

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