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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

अहसास के रिश्ते...


          रामायण कथा का एक अंश, जिससे हमें सीख मिलती है "एहसास" की...  
          श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे, राह बहुत पथरीली और कंटीली थी, अचानक श्री राम के चरणों में कांटा चुभ गया । श्रीराम रुष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे, बोले- "माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी ?"
 
          धरती बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !"
 
         प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज में इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना । कुछ पल के लिए अपने आंचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना । मुझे कांटा चुभा तो कोई बात नहीं, पर मेरे भरत के पांव मे आघात मत लगने देना" ।
          श्री राम को यूं व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई ! पूछा- "भगवन् , धृष्टता क्षमा हो - पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार हैं ?  जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नहीं कर पाएंगे ? फिर उनको लेकर आपके चित्त में ऐसी आकुलता क्यों ?"
 
          श्री राम बोले- "नहीं माते,  आप मेरे कहने का अभिप्राय नहीं समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पांव को नहीं, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा !" 
 
          "हृदय विदीर्ण ! ऐसा क्यों प्रभु ?", धरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !
 
          "अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि... इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पगों में भी चुभे होंगे ! माते, मेरा भरत कल्पना में भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति में आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!"
 
          इसीलिए कहा गया है कि...
 
          रिश्ते खून से नहीं, परिवार से नहीं, मित्रता से नही,  व्यवहार से नही, बल्कि... सिर्फ और सिर्फ आत्मीय "एहसास" से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं ।  जहाँ एहसास ही नहीं, आत्मीयता ही नहीं .. वहाँ अपनापन कहाँ से आएगा ?


1 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रसंग
रिश्तों में आत्मीयता जरुरी है वर्ना वे बेजान होते हैं

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