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बुधवार, 8 जून 2016

एक जमाना था...


            दादी माँ बनाती थी रोटी, पहली गाय की और आखरी कुत्ते की,  हर सुबह नन्दी आ जाता था,  दरवाज़े पर - गुड़ की  डली के लिए ।

            कबूतर का चुग्गा,  चीटियों का आटा, शनिवार, अमावस, पूर्णिमा का सीधा । सरसों का तेल गली में,  काली कुतिया के ब्याने पर, गुड़ चने का प्रसाद,  सभी कुछ  निकल जाता था । वो भी उस घर से, जिसमें भोग विलास के नाम पर एक टेबल फैन भी न होता था ।

            आज सामान से भरे घरों में - कुछ भी नहीं निकलता ! सिवाय लड़ने की कर्कश आवाजों के, या फिर टी वी की आवाजें...

             तब मकान चाहे कच्चे थे, लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे ।

            चारपाई पर  बैठते थे, दिल में प्रेम से रहते थे । सोफे और डबल बैड क्या आ गए ?  दूरियां हमारी बढा गए ।

            छतों पर. सब सोते थे, बात बतंगड खूब होते थे, आंगन में वृक्ष थे, सांझे सबके सुख दुख थे ।

            दरवाजा खुला रहता था, राही भी आ बैठता था, कौवे छत पर कांवते थे, मेहमान भी आते जाते थे ।

            एक साइकिल ही पास था, फिर भी मेल जोल का वास था, रिश्ते सभी निभाते थे, रूठते भी थे और मनाते भी थे ।

            पैसा चाहे कम था, फिर भी माथे पे कोई गम ना था, कान चाहे कच्चे थे, पर रिश्ते सारे सच्चे थे !

             अब शायद सब कुछ पा लिया है, पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया है...

7 टिप्पणियाँ:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - चार विभूतियों की पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-6-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2368 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक अभिव्यक्ति..

मनीष प्रताप ने कहा…

आधुनिकता की आँधी में पुराना सब उड़ गया है....सब कुछ.... उड़ता जा रहा है....। एक कचोट उत्पन्न करती सार्थक रचना।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (10-06-2016) को "पात्र बना परिहास का" (चर्चा अंक-2369) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Asha Joglekar ने कहा…

समय तो बदलता ही रहता है, पुराने को जाकर अपना स्थान नये को देना ही पडता है। िस बात को यूं सोचें कि आयुविज्ञान की प्रगती से मानव का जीवन लंबा हो गया है, लोग ज्यादा है, समय कम हर कोई ज्यादा से ज्यादा पाना चाहता है, तब कुछ ही लोग ऐसे होते थे।

Digamber Naswa ने कहा…

यही तो बात है ... सुख सुविधाएं बढ़ गयीं ... अपनापन कम हो गायक...

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