बुधवार, 22 मई 2013

अविश्वसनीय और अकल्पनीय...

            गणित के ये चमत्कारिक परिणाम...  

            
        1 x 8 + 1 = 9
        12 x 8 + 2 = 98
        123 x 8 + 3 = 987
        1234 x 8 + 4 = 9876
        12345 x 8 + 5 = 98765
        123456 x 8 + 6 = 987654
        1234567 x 8 + 7 = 9876543
        12345678 x 8 + 8 = 98765432
        123456789 x 8 + 9 = 987654321

            1 x 9 + 2 = 11
       12 x 9 + 3 = 111
       123 x 9 + 4 = 1111
       1234 x 9 + 5 = 11111
       12345 x 9 + 6 = 111111
       123456 x 9 + 7 = 1111111
       1234567 x 9 + 8 = 11111111
       12345678 x 9 + 9 = 111111111
       123456789 x 9 +10= 1111111111

         9 x 9 + 7 = 88
      98 x 9 + 6 = 888
      987 x 9 + 5 = 8888
       9876 x 9 + 4 = 88888
       98765 x 9 + 3 = 888888
        987654 x 9 + 2 = 8888888
         9876543 x 9 + 1 = 88888888
         98765432 x 9 + 0 = 888888888

          1 x 1 = 1
       11 x 11 = 121
        111 x 111 = 12321
         1111 x 1111 = 1234321
          11111 x 11111 = 123454321
           111111 x 111111 = 12345654321
           1111111 x 1111111 = 1234567654321
            11111111 x 11111111 =123456787654321
             111111111 x 111111111 =12345678987654321


शुक्रवार, 3 मई 2013

जिन्दगी की अमूल्य नेमत - दोस्ती...

                       दोस्त साथ है तो रोने में भी शान है
दोस्त ना हो तो महफिल भी श्मसान है,
सारा खेल इन दोस्तों का ही है वर्ना,
जनाजे और बारात, दोनों ही एक समान हैं ।

       जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान होता है. इसी प्रकार जिसका कोई नाते-रिश्तेदार नहीं होता उसका भी मित्र तो अवश्य होता ही है । यह ऐसा एकमात्र महत्वपूर्ण रिश्ता है जिसका चुनाव हम स्वयं करते हैं जबकि शेष सभी रिश्ते तो हमारे जन्म के साथ ही हमसे जुडे हुए मिलते हैं किन्तु दोस्ती का रिश्ता अपनी-अपनी रुचियों को ध्यान में रखकर हम स्वयं बनाते हैं, बेशक संयोगों की यहाँ भी कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं होती किन्तु फिर भी कुल मिलाकर जीवन का यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण रिश्ता "दोस्ती" पूर्णतः ऐच्छिक ही रहता है । मित्रता के महत्वपूर्ण एहसास को बडे-बडे विचारकों से लगाकर हमारे-आपके जैसे सामान्य लोगों ने अपने अनुभवों और मान्यताओं के मुताबिक कैसे परिभाषित किया है । देखते हैं...


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  हजारों की भीड में कम से कम एक मित्र तो ऐसा 
होना ही चाहिये कि यदि किसी विशेष विपरीत परिस्थिति में जब हजारों लोग हमारे खिलाफ खडे हो जावें तो वह एक तो हमारे साथ खडा दिख सके ।



सच्चा मित्र वह है जो दर्पण की तरह तुम्हारे दोषों 
को भी तुम्हें दिखाए । जो तुम्हारे अवगुणों को 
गुण बताए, वह तो खुशामदी है ।

  
ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है ।

           मित्र वे दुर्लभ लोग होते हैं, जो हमारा हालचाल 
पूछते हैं और उत्तर सुनने को रुकते भी हैं । 



मित्र पाने की राह है, खुद किसी का मित्र बन जाना ।


सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती और दुर्लभ होते हैं, झूठे दोस्त तो पतझड़ की पत्तियों की तरह 
हर कहीं मिल जाते हैं ।


अपने मित्र को एकांत में नसीहत दो, लेकिन 
प्रशंसा (सही) खुलेआम करो ।


          मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु हर स्थिति में अच्छा है ।


तुम्हारा अपना व्यवहार ही शत्रु अथवा मित्र 
बनाने के लिए उत्तरदायी है । 


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मित्रता करने में धैर्य से काम लो । किंतु जब मित्रता कर ही लो, तो उसे अचल और दृढ़ होकर निभाओ ।


विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि व मृतक का मित्र धर्म होता है।


और अंत में...

 

बुधवार, 11 जुलाई 2012

स्वर्ग और नर्क...



                 किसी पुण्यात्मा को शरीर छूटने के बाद स्वर्ग या नर्क में स्वयं चुनाव करने का अवसर मिला । उन्होंने निर्णय लेने के पूर्व जब दोनों जगह देखने की इच्छा जाहिर की तो देवदूत उन्हें अपने साथ दोनों ही जगह दिखाने लेकर चला । पहले वे नर्क में गये और वहाँ उन्होंने देखा कि सभी नर्कवासी बडी-बडी मेजों पर बैठकर भोजन कर रहे थे और उन सभी के हाथों में बडे-बडे चमचे बंधे हुए थे जिसके कारण वे प्लेट से खाना उठा तो पा रहे थे किन्तु जैसे ही वे उसे अपने मुँह में डालने का प्रयास करते तो उस बडे चमचे का भोजन उनके मुँह में जाने के बजाय उनके सिर के पीछे जाकर गिर जाता और वे सभी नर्कवासी भोजन के करीब बैठकर भी भूखे ही रह पाने के लिये अभिशप्त लग रहे थे ।

          अब उस पुण्यात्मा ने स्वर्ग जाकर देखने की इच्छा जाहिर की तो देवदूत उन्हे लेकर स्वर्ग पहुँचा वहाँ भी उन्हे वैसा ही मिलता-जुलता दृश्य देखने को मिला । वहाँ भी सभी स्वर्गवासी वैसी ही बडी-बडी मेजों पर बैठकर भोजन कर रहे थे और उन सबके हाथों में भी वैसे ही बडे-बडे चमचे बंधे हुए थे जिसके कारण वे स्वर्गवासी भी अपने हाथ से भोजन ग्रहण कर पाने में असमर्थ लग रहे थे किन्तु यहाँ एक अन्तर दिख रहा था और वो यह कि वे सभी स्वर्गवासी चम्मच में भोजन लेकर अपनी बजाय अपने साथ वाले के मुँह में वह भोजन डाल रहे थे और इस प्रकार उन सभी की क्षुधा आसानी से तृप्त हो रही थी ।

          फंडा यह है कि - जब हमारे साथ रहने वाले हमारा और हम उनका ध्यान रख रहे होते हैं तो वहाँ स्वर्ग होता है और जहाँ हर व्यक्ति सिर्फ अपनी ही मैं - मैं में लगा रहता है वहीं नर्क होता है । 

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

बंटवारा (बोधकथा)

         पूर्व समय में शाम के झुरमुटे में शिकार से वापसी के दौरान किसी राज्य के राजा जब अपनी सेना से आगे-पीछे होने के कारण अकेले वापस आ रहे थे तब उन्होंने एक लकडहारे को अपनी बांसुरी की धुन में मगन गांव की ओर जाते हुए देखा । सामान्य बातचीत में राजा ने जब उससे पूछा कि उसकी आमदनी क्या  है और कैसे उसका गुजारा चलता है तो लकडहारा बोला- महाराज मैं चार मुद्राएँ रोज कमा लेता हूँ और उनमें से एक मुद्रा कुएं में फेंक देता हूँ, दूसरी मुद्रा मैं कर्ज में चुका देता हूँ, तीसरी मुद्रा को मैं उधार दे देता हूँ, और चौथी जमीन में गाड देता हुँ । 


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       राजा को उस लकडहारे के अपनी कमाई को उपयोग में लाने का यह तरीका समझ में नहीं आया लेकिन बात आगे बढने  के पूर्व ही उनका सेनापति अपने सैनिकों के साथ राजा को खोजते हुए उनके करीब आ गया और राजा अपने लश्कर के साथ अपने राज्य में वापस आ गये ।

          दूसरे दिन दरबार में राजा ने अपने सभी दरबारियों से लकडहारे के अपनी आमदनी को खर्च करने के इस तरीके का मतलब समझाने को कहा तो सभी विद्वान दरबारी इसका कोई भी संतोषप्रद उत्तर नहीं दे पाये । तब राजा ने सैनिकों को भेजकर उस लकडहारे को राज्य में बुलवाया और सभी दरबारियों के समक्ष अपनी कमाई की उन चार मुद्राओं के उपयोग के तरीके को विस्तार से समझाने को कहा तब लकडहारे ने अपनी आमदनी के उपयोग का तरीका बताते हुए कहा-

         
महाराज पहली मुद्रा मैं कुएं में फेंक देता हूँ याने अपने परिवार के भरण-पोषण के काम में लाता हूँ, दूसरी मुद्रा से मैं कर्ज चुकाता हूँ याने मेरे माता पिता जिन्होंने मेरे जन्म से लगाकर मेरे जीवन में स्थापित होने तक मेरे लिये लगातार मेहनत की उनकी वृद्धावस्था में होने वाली सभी समस्याओं को दूर करने में काम में लाता हूँ, तीसरी मुद्रा मैं उधार दे देता हूँ याने अपने बच्चों की उचित शिक्षा-दिक्षा के काम में लाता हूँ और चौथी मुद्रा जिसे मैं जमीन में गाड देता हूँ अर्थात धर्म व समाज से जुडी वो सभी जिम्मेदारियां जहाँ मेरे योगदान की आवश्यकता होती है उस जगह उसका उपयोग कर लेता हूँ ।

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होनहार...
एक सच यह भी...!
कमर-दर्द (पीठ के दर्द) से बचाव के लिये-

          राजा के साथ ही सभी दरबारी भी लकडहारे के द्वारा अपनी आमदनी के बंटवारे के इस सूझ-बूझ पूर्ण उत्तर से अत्यन्त प्रभावित हुए और राजा ने भरपूर ईनाम के साथ ससम्मान उस लकडहारे को राजदरबार से विदा किया ।      


मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तनाव का सामना


        ससुराल से पहली बार वापस आई बेटी अपनी माँ को ससुराल के बडे परिवार की समस्याओं के बारे में लगातार परेशान होकर बता रही थी कि मैं तो सबसे तालमेल बैठाते हुए परेशान हो चुकी हूँ । मैं कितनी भी कोशिश करुँ किसी न किसी को मुझसे शिकायत दिख ही जाती है । समझ मैं नहीं आता सबके साथ कैसे निबाह कर पाऊँगी ।

          किचन में बेटी की बात सुनते-सुनते माँ ने तीन बर्तनों में पानी भरकर आँच पर चढाया फिर एक बर्तन में गाजर डाली, दूसरे में एक अंडा डाला और तीसरे बर्तन में काफी के बीज डाल दिये । पन्द्रह-बीस मिनिट के बाद उसने तीनों बर्तनों को आँच से उतारकर एक-एक बर्तन को बेटी से जांचने को कहा । बेटी ने पहले गाजर को परखा, वह पानी में उबलकर बहुत नर्म हो गई थी । दूसरे बर्तन से अंडे के बाहरी आवरण को हटाकर देखा तो उसका अन्दर का तरल पदार्थ कठोर हो गया था । एकमात्र काफी थी जिस पर उस आंच का कोई असर नहीं हुआ बल्कि उसने पानी का रंग भी बदल दिया था और उस पानी में काफी की खुशबू भी आने लगी थी ।
  
          माँ ने बेटी को बताया- ये सभी चीजें समान स्थिति में गर्म पानी से होकर गुजरी हैं, लेकिन असर सब पर अलग-अलग हुआ है । तुम इनमें से किसके जैसी हो, गाजर जो वैसे तो कठोर दिखती है लेकिन बुरा समय आते ही नर्म पड जाती है, या अंडा जो गर्म पानी के कारण खुदको परिवर्तित कर लेता है, या फिर काफी की तरह हो जो गर्म पानी का भी रंग बदल सकती है । जैसे-जैसे पानी गर्म होता गया उसकी खुशबू भी चारों ओर फैलती चली गई ।
 
          बेटी को अपनी समस्याओं का समाधान मिल गया और वह नई उर्जा के साथ अपने ससुराल जाने की तैयारी करने लगी ।

ऐतिहासिक शख्सियत...

पागी            फोटो में दिखाई देने वाला जो वृद्ध गड़रिया है    वास्तव में ये एक विलक्षण प्रतिभा का जानकार रहा है जिसे उपनाम मिला था...