संसार का कोई भी पदार्थ अपने आप में अच्छा या बुरा
नहीं होता,
उसका अच्छा या बुरा होना, हितकारी या अहितकारी होना या लाभकारी या हानिकारक
होना उसके उपयोग,
उपयोग के उद्देश्य और उसके परिणाम पर निर्भर
होता है । उचित युक्ति और मात्रा के साथ प्रयोग करने पर जहर भी औषधि का काम करता
है, जबकि अनुचित मात्रा में किया गया स्वादिष्ट भोजन भी
विष (फूड पाईजन) का काम करता है । हमारे जीवन में कुछ ऐसी विषम परिस्थितियां
निर्मित होती हैं जो विष के समान हानिकारक सिद्ध होती हैं । ऐसी कुछ स्थितियां ये
भी हैं-
घी
और शहद समान मात्रा में मिलने पर विषतुल्य हो जाते हैं ।
खाया हुआ आहार ठीक
से न पचने पर विषतुल्य हो जाता है ।
वृद्ध पुरुष के लिये
युवा पत्नी विषतुल्य हो जाती है ।
कटु वचन बोलने से
वाणी विषतुल्य हो जाती है ।
विद्यार्थी के लिये
आलस्य विषतुल्य हो जाता है ।
तरुणी विधवा के लिये
कामवासना विषतुल्य हो जाती है ।
पत्नी के लिये
नपुंसक पति विषतुल्य हो जाता है ।
कुलटा और कर्कश
पत्नी पति के लिये विषतुल्य हो जाती है ।
भोगविलास में अति
स्त्री-पुरुष के लिये विषतुल्य हो जाती है ।
अवज्ञाकारी व मूर्ख
पुत्र, पिता
के लिये विषतुल्य हो जाता है ।
कर्ज लेते रहने वाला
व्यसनी पिता सन्तान के लिये विषतुल्य हो जाता है ।
मूढ और आलसी शिष्य
गुरु के लिये विषतुल्य हो जाता है ।
निर्धन के लिये
महत्वाकांक्षाएं विषतुल्य हो जाती हैं ।
और...
अति करना सभी जगह
विषतुल्य ही साबित होता है ।


