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रविवार, 2 जनवरी 2011

विचार यात्रा- विवेक. (लघुकथा)

समझा समझा एक है, अनसमझा सब एक.
समझा  सोई  जानिये,  जाके ह्रदय विवेक.

          बादशाह की सवारी निकल रही थी । राह में एक फकीर की याचना पर मुट्ठी भर स्वर्ण मुद्राएँ बादशाह की ओर से उसे प्राप्त हो गई । किन्तु उनमें से एक स्वर्ण मुद्रा भूमि पर गिर पडी जिस पर से शाही कारवां के अनेक घोडों के गुजर जाने के कारण वह मुद्रा जमीन की मिट्टी में लुप्त हो गई । फकीर के समक्ष ढेर सी स्वर्ण मुद्रा पा लेने का सुख छोटा हो गया और उस एक स्वर्ण मुद्रा के कच्ची जमीन में गिरकर मिट्टी में गुम हो जाने का दुःख बडा हो गया ।

          सुबह से शाम हो गई । फकीर उस मुद्रा को उसी स्थल पर खोजता ही रहा ।

          संयोगवश शाम को बादशाह का उधर फिर से निकलना हुआ । फकीर को पहचानते हुए बादशाह ने फकीर से उस अस्त-व्यस्त हाल में वहीं उलझे रहने का कारण पूछा- और संयोग कहें या दुर्योग, उस फकीर के मुख से वास्तविक कारण बादशाह के सामने उजागर भी हो गया कि सुबह आपसे मिली स्वर्ण मुद्राओं में से एक मुद्रा जो यहाँ गिर पडी थी में उसे ही ढूँढ रहा हूँ । उसका उत्तर सुन बादशाह क्रोधित होकर उससे बोले- मैंने तुझे ढेरसी स्वर्ण मुद्राएँ दी उसका सुख लेने के बजाय तू यहाँ जमीन में गिरी एक स्वर्ण मुद्रा को सुबह से खोजने में लगा है । तुझ जैसे लालची को तो इन स्वर्ण मुद्राओं की बजाय सजा मिलनी चाहिये ।

          सजा के भय से थरथराता फकीर बादशाह से बोला- महाराज मैं उस स्वर्ण मुद्रा को किसी लालच के कारण नहीं ढूँढ रहा हूँ । बल्कि ये सोचकर ढूँढ रहा हूँ कि जाने-अनजाने किसी भी राहगीर का उस स्वर्ण मुद्रा पर यदि पांव पड गया तो ? आखिर उस पर चित्र तो आपका ही अंकित है, और आपका किसी से भूले से भी अनादर ना हो जावे यही सोचकर मैं उस स्वर्ण मुद्रा को ढूँढने में लगा हुआ हूँ ।

          कहने की आवश्यकता नहीं कि सहज बुद्धि से उपजी उस फकीर की हाजिर-जवाबी ने न सिर्फ बादशाह के तात्कालिक क्रोध से उसकी रक्षा कि बल्कि दुगना इनाम लेने के साथ ही बादशाह की नजरों में उसका रुतबा भी बुलन्द करवा दिया ।
          सामान्य तौर पर "असाधारण मात्रा में साधारण ज्ञान की मौजूदगी ही विवेक कहलाती है ।"

6 टिप्पणियाँ:

ajit gupta ने कहा…

असाधारण मात्रा में साधारण ज्ञान की मौजूदगी ही विवेक कहलाती है ।"
बहुत ही अच्‍छी और प्रेरक बात, कथानक से कही गयी है। हमारा विवेक ही हमें उन्‍नति के शिखर पर ले जाता है।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आपने सही लिखा है। बुनियादी बातों का ज्ञान ही वास्विक ज्ञान है। आपका यह कथात्मक-लेख बहुत अच्छा है। विचारणीय है।
बधाई स्वीकारें! नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।

निर्मला कपिला ने कहा…

सुन्दर प्रेरक बोध कथा। आपको सपरिवार नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।

JAGDISH BALI ने कहा…

एक नहीं दो सुक्तियां का सामां इस लेख मे है !

Dorothy ने कहा…

सुन्दर प्रेरक बोध कथा के लिए आभार.
सादर,
डोरोथी.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विवेक ही कहा जायेगा यह।

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